Breaking News

J-K: किश्तवाड़ में सुरक्षाबलों की आतंकियों से मुठभेड़, जैश का एक आतंकी ढेर     |   जम्मू में बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा का राहुल गांधी के खिलाफ प्रदर्शन     |   लोकसभा में नहीं हुआ पीएम मोदी का संबोधन, हंगामे के बीच कार्यवाही फिर स्थगित     |   पीएम मोदी आज शाम 5 बजे संसद को करेंगे संबोधित     |   काठमांडू-इस्तांबुल फ्लाइट की कोलकाता एयरपोर्ट पर इमरजेंसी लैंडिंग     |  

कृष्ण की दीवानी- मीराबाई, भक्त और भगवान के बीच का एक अनोखा रिशता

भक्ति केवल पूजा करने या मंदिर जाने से नहीं होती, भक्ति तो प्रेम का अहसास है, जब भक्ति प्रेम में बदल जाए, जब भक्त और भगवान का रिशता सांसों से जुड़ जाए , तब वह भक्ति मीरा जैसी बन जाती है। आप सभी ने बहुत सी भक्ति भावनात्मक कथाएं सुनी होंगी। कहते है भक्ति तब पूर्ण रूप से सच्ची होती है जब उसमें किसी प्रकार की शर्तें नहीं होती। 

जैसे त्रेता युग में शबरी ने भगवान श्री राम को झूठे बेर चखाकर असली भक्ति का रूप दर्शाया था  वैसे ही मीराबाई ने अपना सबकुछ त्याग कर श्री कृष्ण की सच्चे मन मे भक्ति की। वह रानी तो थीं लेकिन महलों की नहीं अपने ठाकुर के चरणों की। गोकुल की गलियों में जहां राधा रानी ने कान्हा संग लीलाएं रची, वहीं सैंकड़ों वर्ष बाद मेवाड़ की भूमी पर जन्मी एक और प्रेमिका - मीरा। मीरा ने श्री कृष्ण को ही अपना जीवन संगी चुना। एक तरफ जहां राधा का प्रेम समाजिक था वहीं दूसरी ओर मीरा का प्रेम त्यागमय।
 
यह सन 1498 शताब्दी की बात है, राजस्थान के एक छोटे से राजघराने मेड़ता में एक सुंदर, चंचल बच्ची का जन्म हुआ। उस बच्ची का नाम मीरा रखा गया। मीरा राजकुमारी थीं लेकिन उन्हें कभी रानी बनने की चाह नहीं थी। उनका भाव तो श्री कृष्ण के प्रति ही समर्पित था। वह बचपन से ही कान्हा की कहानियां अपनी दादी से सुना करती थीं।

जब मीरा महज पांच-छह साल की थी तब वह अपनी माता के साथ पड़ोस की एक कन्या के विवाह में गई थीं। विवाह में डोली देखकर मीरा ने अपनी माता से पूछा कि मेरे पति कौन है? तब उनकी माता ने भगवान श्री कृष्ण की मूर्ती उठाकर मुसकुराते हुए उनसे कहा कि यही तुम्हारे पति हैं। मीरा उस मूर्ती को देखकर जैसे सम्मोहित हो गई, बस उसी दिन से मीरा ने अपने आप को श्री कृष्ण को समर्पित कर दिया। मीरा उनसे बातें करती, उनकी अराधना करती और कृष्ण के भजन भी गुनगुनाती थीं। उनके लिए श्री कृष्ण भगवान के साथ साथ उनके साथी और उनके जीवन का लक्ष्य बन गए थे।

समय बीता और जैसे हर लड़की का विवाह होता है वैसे ही मीरा का विवाह भी मेवाड़ के राजा भोजराज से तय किया गया। विवाह के समय मीरा ने कहा कि वह पूर्ण रूप से श्री कृष्ण को अपना पति मान चुकी हैं, लेकिन तब किसी ने उनकी बात गंभीरता से नहीं ली। विवाह के बाद मीरा चित्तोड़ चली गई, लेकिन उनका मन वहां कभी नहीं लगा। 

मीरा राजमहल में रहते हुए भी मंदिरों में जाती थी। कभी श्री कृष्ण के लिए गीत गाती, कभी तानपुरा में उनके लिए भजन बनाती, कभी अकेले बैठ कर उनसे बातें करती और कभी उनकी याद में रोती रहती। धीरे धीरे यह बात महलवालों को खटकने लगी। राजघराने को मीरा की यह भक्ति पसंद नहीं आई। राजघराने के लोग मीरा को ताना मारकर कहते थे की तेरे श्री कृष्ण सिर्फ मूर्ति में बसे है, लेकिन मीरा हर बार एक ही जवाब देती कि मेरे कृष्ण जीवित है और मैं तो उन्हीं की दासी हूं। जब मीरा के पति की मृत्यु हुई, तब राजमहल के लोगों ने उन्हीं पर आरोप लगाया। राजमहल के लोगों ने मीरा को जहर देने की भी साजिश की। उन्हें एक विष का प्याला पीने के लिए दिया गया, लेकिन जब मीरा ने उस प्याले को श्री कृष्ण का प्रसाद समझकर पीया, तब वह विष भी अमृत बन गया। इसके बाद मीरा ने सब कुछ छोड़ दिया-राजपाठ, राजमहल, वैभव और वो केवल कृष्ण की भक्ति में डूब गई। 

वह वृंदावन, द्वारका और अन्य तीर्थों पर नाचते, गाते श्री कृष्ण की खोज में गई। लोग उन्हें पागल कहते थे, लेकिन मीरा को पता था कि उनका ये पागलपन श्री कृष्ण के लिए एक सच्ची प्रेम और आस्था है। 

मीराबाई की मृत्यु को लेकर काफी कहानियां हैं। आज भी लोगों के मन में कई सवाल उठते हैं कि क्या भगवान श्री कृष्ण ने मीरा को दर्शन दिए। यह सवाल अभी भी रहस्यमय है। कुछ कहते हैं वो द्वारका में मृत्यु को प्राप्त हुई, तो कुछ कहते हैं वृंदावन में। लोगों का एसा भी मानना है कि जन्माष्टमी के दिन वो मंदिर में भगवान कृष्ण के लिए नाचती-गाती रहीं, तभी अचानक मंदिर के दरवाजे बंद हो गए। जब दरवाजे खुले, तो मीरा वहां नहीं थीं, सिर्फ उनकी साड़ी कृष्ण की मूर्ति से लिपटी हुई थी। लोग मानते हैं कि उनकी मृत्यु नही हुई, बल्कि वो भगवान कृष्ण में वलीन हो गईं।

मीराबाई की कहानी सच्चा भक्ति भाव दर्षाता है और इस कहानी से मुझे सन 1958 की फिल्म के उस गीत का स्मर्ण हुआ "एक राधा एक मीरा, दोनों ने श्याम को चाहा, अंतर क्या दोनों की चाह में बोलो ? " यह गीत सिर्फ एक गीत नहीं है, यह सच्ची कहानी है। वो कहानी जिसमें राधा ने प्रेम को जिया और मीरा ने पूजा को।