गोरक्षपीठ के पूर्व पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं पुण्यतिथि पर मंगलवार, 29 सितंबर को गोरखनाथ मंदिर में श्रद्धांजलि सभा आयोजित होगी। गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में होने वाली इस सभा में देशभर से संतजन शामिल होंगे। महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि के अवसर पर गोरक्षपीठ में 23 सितंबर से श्रीमद्भागवत महापुराण कथा और 24 सितंबर से समसामयिक विषयों पर सम्मेलन चल रहा है। मंगलवार को महंत दिग्विजयनाथ स्मृति सभागार में विशाल श्रद्धांजलि सभा होगी।
राष्ट्र, धर्म और समाजसेवा को बनाया जीवन का उद्देश्य
महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज वर्ष 1935 से 1969 तक गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर रहे। उनका जीवन राष्ट्र, धर्म, अध्यात्म, संस्कृति, शिक्षा और समाजसेवा के लिए समर्पित रहा। उन्होंने युवावस्था से ही देश की आजादी की लड़ाई में भाग लिया। 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के समर्थन में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था। ब्रिटिश शासन के दौरान उन पर क्रांतिकारियों को संरक्षण और सहयोग देने के आरोप भी लगाए गए। 1922 के चौरीचौरा घटनाक्रम के संदर्भ में भी उनका नाम आया था, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में रिहा कर दिया गया।
1935 में बने गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर
महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज का जन्म 1894 में राजस्थान के चित्तौड़, मेवाड़ क्षेत्र के ककरहवां में हुआ था। उनका बचपन का नाम नान्हू सिंह था। पांच वर्ष की उम्र में 1899 में उनका गोरखपुर की गोरक्षपीठ में आगमन हुआ। गोरखपुर में ही उनकी शिक्षा हुई। 15 अगस्त 1933 को गोरखनाथ मंदिर में उनकी योग दीक्षा हुई और 15 अगस्त 1935 को वह गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर बने।
श्रीराम मंदिर आंदोलन में निभाई भूमिका
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े आंदोलनों में गोरक्षपीठ की भूमिका का भी उल्लेख किया जाता है। महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज ने 1934 से 1949 तक इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई। 1949 में वह श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं में रहे। 22-23 दिसंबर 1949 को अयोध्या में रामलला की मूर्ति प्रकट होने से नौ दिन पहले उनके नेतृत्व में अखंड रामायण पाठ शुरू हुआ था। रामलला के प्रकट होने के समय महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के वहां मौजूद होने का भी उल्लेख किया जाता है।
शिक्षा के क्षेत्र में छोड़ी बड़ी विरासत
महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज ने पूर्वांचल में शिक्षा के विस्तार पर विशेष जोर दिया। वर्ष 1932 में उन्होंने महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की। इसके तहत एक किराए के मकान में महाराणा प्रताप क्षत्रिय स्कूल की शुरुआत हुई।
1935 में स्कूल को जूनियर हाईस्कूल और 1936 में हाईस्कूल की मान्यता मिली। बाद में सिविल लाइंस में परिषद को भूमि मिली और महाराणा प्रताप हाईस्कूल का विस्तार हुआ। आजादी के समय यह महाराणा प्रताप इंटरमीडिएट कॉलेज के रूप में स्थापित हो चुका था।
1949-50 में महाराणा प्रताप डिग्री कॉलेज की स्थापना हुई। वर्ष 1958 में महंत दिग्विजयनाथ जी ने महाराणा प्रताप डिग्री कॉलेज और महाराणा प्रताप महिला महाविद्यालय को गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दान में दिया।
वर्तमान में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के तहत गोरखपुर क्षेत्र में चार दर्जन से अधिक शिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं। इनमें प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा और तकनीकी शिक्षा से जुड़े संस्थान शामिल हैं।
राजनीति में भी लोक कल्याण को बताया ध्येय
महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज ने राजनीति में भी लोक कल्याण को अपने कार्य का आधार बनाया। वर्ष 1937 में उन्होंने हिंदू महासभा से जुड़कर राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। 1944 में उन्होंने हिंदू महासभा के प्रांतीय अधिवेशन का आयोजन गोरखपुर में कराया।
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। बाद में 1949 में उन्हें रिहा कर दिया गया। 1956 में उन्होंने मास्टर तारा सिंह के पृथक पंजाबी राज्य की मांग को लेकर चल रहे आमरण अनशन को समाप्त कराने में भूमिका निभाई।
1961 में वह अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 1939 में अखिल भारतीय अवधूत भेष बारहपंथ योगी महासभा की स्थापना, 1960 में हरिद्वार में अखिल भारतीय षडदर्शन सभा सम्मेलन की अध्यक्षता और 1961 व 1965 में दिल्ली में हिंदू सम्मेलनों के आयोजन को भी उनके सार्वजनिक जीवन से जोड़ा जाता है।
1967 में बने सांसद
महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज वर्ष 1967 में गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। वर्ष 1969 में उनका निधन हुआ। उनके अनुयायियों और गोरक्षपीठ से जुड़े संस्थानों के अनुसार, उनके द्वारा शिक्षा, समाजसेवा और राष्ट्रहित के लिए किए गए कार्य आज भी उनकी विरासत के रूप में आगे बढ़ रहे हैं।