केंद्र सरकार की आज होने वाली कैबिनेट मीटिंग पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। मीटिंग से एक दिन पहले हुई दो अहम घटनाओं ने संभावित कैबिनेट फेरबदल की चर्चाओं को और तेज कर दिया है। केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन के इस्तीफे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात के बाद सियासी हलकों में मंत्रिमंडल में बदलाव की अटकलें लगाई जा रही हैं।
मंगलवार सुबह केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हो चुका था और भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा। जॉर्ज कुरियन अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत थे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है।
मंगलवार शाम राष्ट्रपति भवन में आयोजित पद्म पुरस्कार समारोह के बाद पीएम मोदी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की। इस मुलाकात को भी राजनीतिक विश्लेषक संभावित कैबिनेट फेरबदल से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि मुलाकात के संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया। जॉर्ज कुरियन का कार्यकाल 21 जून को समाप्त होने के बाद उन्होंने मंत्री पद छोड़ दिया। वहीं रवनीत सिंह बिट्टू का राज्यसभा कार्यकाल भी खत्म हो चुका है, लेकिन उन्होंने अभी मंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया है। नियमों के अनुसार वे अगले छह महीने तक सांसद बने बिना भी मंत्री पद पर बने रह सकते हैं।
रवनीत सिंह बिट्टू ने हाल के दिनों में संकेत दिए हैं कि वे पंजाब की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में वे चुनाव लड़ सकते हैं और पंजाब में अधिक सक्रिय होकर काम करना चाहते हैं। भाजपा के भीतर 'वन मैन, वन पोस्ट' सिद्धांत को भी संभावित फेरबदल का एक कारण माना जा रहा है। हाल ही में हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली भाजपा अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि वे केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं।
इसी तरह पंकज चौधरी उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष होने के साथ-साथ वित्त राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिलने के बाद कुछ नेताओं को मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है। हाल के महीनों में कई विपक्षी दलों के नेता और सांसद NDA के करीब आए हैं। इनमें आम आदमी पार्टी से जुड़े सात सांसदों का नाम चर्चा में है। इन सांसदों में राघव चड्ढा का नाम भी शामिल बताया जा रहा है।
इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 लोकसभा सांसद त्रिपुरा की NCPI में विलय कर चुके हैं। इन सांसदों ने एनडीए को समर्थन देने की बात कही है। उधर, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) छोड़कर एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हुए छह सांसदों को भी सरकार या संगठन में जिम्मेदारी मिलने की संभावना को लेकर चर्चा जारी है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार केंद्र सरकार संसद में अपनी संख्या और मजबूत करने की रणनीति पर काम कर सकती है। माना जा रहा है कि भविष्य में कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसे में सहयोगी दलों और समर्थन देने वाले सांसदों को साथ बनाए रखना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसी वजह से नए सहयोगियों को मंत्रिमंडल या संगठन में स्थान देने की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है।
अगले साल पंजाब और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में भाजपा क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए मंत्रिमंडल में बदलाव कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संभावित फेरबदल में चुनावी राज्यों को विशेष महत्व दिया जा सकता है और उसी आधार पर नए चेहरों को जिम्मेदारी मिल सकती है।