जोधपुर, 13 मई (भाषा) राजस्थान उच्च न्यायालय ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए खेजड़ी के वृक्ष काटने के प्रस्ताव पर चिंता जताते हुए कहा कि यह प्रौद्योगकी विकास के नाम पर पर्यावरणीय विनाश का एक “स्पष्ट उदाहरण” है।
न्यायालय ने आशा जताई कि वृक्षों के संरक्षण के लिए नियुक्त सरकारी समिति किसी भी पेड़ को नुकसान से बचाने के लिए हर उचित विकल्प अपनाएगी।
न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति संदीप शाह की एक पीठ ने ‘‘श्री जंबेश्वर पर्यावरण एवं जीव रक्षा प्रदेश संस्था नामक गैर सरकारी संगठन’’ (एनजीओ) की जनहित याचिका का निपटारा करते हुए ये टिप्पणियां कीं। याचिका में राजस्थान में खेजड़ी के पेड़ों को बचाने का अनुरोध किया गया था।
पीठ ने निर्देश दिया कि कानून के अनुसार पूर्व अनुमति के बिना कोई भी पेड़ नहीं काटा जाए। अदालत ने कहा कि इस मामले पर गौर करने और पेड़ों की सुरक्षा के उपाय सुझाने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित समिति को पहले से सही जानकारी दी जानी चाहिए।
खेजड़ी के पर्यावरणीय महत्व का ज़िक्र करते हुए अदालत ने कहा कि यह दुर्लभ रेगिस्तानी पेड़ सूखे इलाकों में बहुत कम संख्या में उगता है, फिर भी सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए इसे काटने का प्रस्ताव दिया जा रहा है।
पीठ ने कहा, “यह बेहद विडंबनापूर्ण है।”
अदालत ने सवाल किया कि क्या समाज प्रौद्योगिकी के नाम पर प्रकृति को नष्ट कर रहा है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि उसने इस मामले का पहले ही संज्ञान ले लिया है और नौ मार्च 2026 के आदेश के तहत एक विशेष समिति गठित की गई है।
सरकार ने कहा कि इस समिति को विभिन्न राज्यों के वृक्ष संरक्षण कानूनों का तुलनात्मक अध्ययन करने, हितधारकों से परामर्श लेने और पेड़ों के संरक्षण से जुड़े न्यायालिका के फैसलों व मौजूदा कानूनी प्रावधानों की समीक्षा करने का काम सौंपा गया है।
सरकार के अनुसार समिति को एक महीने में मसौदा प्रस्ताव तैयार करना है।
पीठ ने कहा, “हम यह बात जोड़ने के लिए बाध्य महसूस कर रहे हैं, ताकि गठित समिति को समझाने में मदद मिले, कि मानवता के रूप में हमारी तकनीकी प्रगति की यात्रा ने पर्यावरणीय विनाश की एक लंबी श्रृंखला भी छोड़ी है। हमारे सामने यह मामला इसका स्पष्ट उदाहरण है।”
पीठ ने कहा, “हम यह बात इसलिए कहना जरूरी समझ रहे हैं ताकि समिति समझ सके कि मनुष्य जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी के मामले में आगे बढ़ता गया है, वैसे-वैसे उसने पर्यावरण को भी काफी नुकसान पहुंचाया है। हमारे सामने जो मामला है, वह इसका स्पष्ट उदाहरण है।”
अदालत ने कहा कि उसे आशा है कि वृक्षों के संरक्षण के लिए नियुक्त सरकारी समिति किसी भी पेड़ को नुकसान से बचाने के लिए हर उचित विकल्प अपनाएगी ताकि ऐसा कोई नुकसान न हो, जिसकी बाद में भरपाई न की जा सके।
आदेश आठ मई को सुनाया गया था और बुधवार को यह अपलोड किया गया।
अदालत ने 1730 में खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए दिए गए ऐतिहासिक बलिदान का भी उल्लेख किया, जब बिश्नोई समुदाय के कई लोगों ने पेड़ों की कटाई का विरोध करते हुए अपनी जान दे दी थी।
पीठ ने मौजूदा स्थिति की तुलना करते हुए कहा कि शायद अब फिर से समय आ गया है कि सरकार पेड़ों और पर्यावरणीय संतुलन की रक्षा के लिए कोई “फरमान” जारी करे।
जनहित याचिका में मांग की गई थी कि तय प्रक्रिया का पालन किए बिना पेड़ों, खासकर खेजड़ी, की कथित अवैध कटाई पर रोक लगाई जाए।
याचिकाकर्ता संगठन ने राज्य सरकार से यह मांग भी की कि दूसरे राज्यों की तरह नया वृक्ष संरक्षण अधिनियम बनाया जाए या खेजड़ी के पेड़ों की सुरक्षा के लिए उचित दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
संगठन ने राजस्थान में निजी और गैर-वन भूमि पर ‘एग्रोफॉरेस्ट्री’ को बढ़ावा देने तथा पेड़ों की कटाई के बदले नए पेड़ लगाने की व्यवस्था बनाने की भी मांग की।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विजय बिश्नोई ने कहा कि राज्य की सौर ऊर्जा नीति को लागू करने के नाम पर मौजूदा हरित क्षेत्र को बिना सोचे-समझे साफ किया जा रहा है।
उन्होंने दलील दी कि प्रभावित जमीन ज्यादातर बंजर है और खेजड़ी के पेड़ उन गिनी-चुनी प्रजातियों में हैं, जो रेगिस्तान की कठिन जलवायु में भी प्राकृतिक रूप से जीवित रह सकती हैं।
वकील ने यह भी कहा कि स्थानीय समुदायों के लिए इस पेड़ का भावनात्मक और धार्मिक महत्व भी है।
भाषा जोहेब माधव
माधव