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बिहार के सीएम के तौर पर 'सुशासन बाबू' का दो दशक लंबा सफर थमा, नीतीश कुमार ने छोड़ी कमान

Bihar Politics: जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। इसके साथ ही सबसे लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहने वाला उनका कार्यकाल खत्म हुआ। नीतीश 2005 से राज्य की अगुवाई करते रहे। बीच-बीच में कुछ छोटे समय को छोड़ कर राज्य की बागडोर उनके हाथ में रही। सवाल है कि वे बिहार के लिए इतने अभिन्न और अपरिहार्य क्यों थे?

आइए उनके राजनीतिक सफर पर एक नजर डालते हैं:

एक मार्च, 1951 को बिहार में पटना जिले के छोटे से गांव बख्तियारपुर में एक साधारण परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। बच्चे का नाम मुन्ना रखा गया। वही मुन्ना बाद में नीतीश कुमार बने। उनके पिता, कविराज राम लखन सिंह, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और स्वतंत्रता सेनानी सत्येंद्र नारायण सिन्हा के करीबी माने जाते थे।

नीतीश कुमार ने बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाई के दौरान राजनीति में कदम रखा, जहां से उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री ली। ये कॉलेज अब आईआईटी, पटना के नाम से जाना जाता है। उन्होंने राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, कर्पूरी ठाकुर और वी. पी. सिंह जैसे समाजवादी दिग्गजों से राजनीति की बारीकियां सीखीं।

नीतीश कुमार ने विधायक बनकर बिहार विधानसभा में पहली बार 1985 में कदम रखा। 1989 में वे लोकसभा चुनाव जीते और सांसद बने। इसके बाद वे कई बार लोकसभा के लिए चुने गए। कृषि और रेलवे सहित कई महत्वपूर्ण विभागों के केंद्रीय मंत्री रहे।

नीतीश कुमार ने 2000 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी, लेकिन बहुमत न मिलने के कारण उन्हें महज सात दिन में इस्तीफा देना पड़ा। जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार को राजनीतिक समीकरण संभालने की कला में महारत हासिल था। वे कॉलेज के अपने दोस्त और राजनीतिक सहयोगी लालू प्रसाद यादव से अलग हुए और 1994 में जॉर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी का गठन किया।

बाद में उन्होंने कई गठबंधन बनाए - कभी वैचारिक सहयोगियों के साथ तो कभी अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ। मुख्यमंत्री के रूप में, नीतीश कुमार के सिर पर बिहार के विकास, राज्य प्रशासन और पुलिस व्यवस्था में सुधार और कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाने का सेहरा बंधता है।

राज्य के विकास में उनके योगदान के लिए उन्हें 'सुशासन बाबू' के नाम से जाना जाने लगा। मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने 2016 में बिहार में शराबबंदी लागू की। इसे महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए उठाया गया कदम माना गया।

2020 और 2025 के विधानसभा चुनावों के नतीजे इस कदम की कामयाबी की मिसाल हैं। राज्य सभा के लिए चुने जाने से पहले नीतीश कुमार ने कहा था कि वे अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत से ही बिहार विधानसभा के दोनों सदनों और संसद के दोनों सदनों के सदस्य बनना चाहते थे।