भारत के आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का 7 नवंबर 1862 को ब्रिटिश शासन वाले बर्मा के रंगून (अब यांगून) में निधन हो गया था। आज उनकी पुण्यतिथि के 164 साल पूरे हो गए हैं। कभी भारत के सबसे शक्तिशाली शासकों में शामिल मुगल वंश के आखिरी बादशाह ने अपने जीवन के अंतिम दिन अपनी मातृभूमि से दूर निर्वासन में बिताए थे।
बहादुर शाह जफर का जन्म 24 अक्टूबर 1775 को दिल्ली के शाहजहानाबाद में हुआ था। उनके पिता मुगल सम्राट अकबर शाह द्वितीय और माता लाल बाई थीं। जफर का पूरा नाम बहादुर शाह था, जबकि ‘जफर’ उनका तखल्लुस यानी काव्य नाम था। उन्हें इतिहास में आखिरी मुगल बादशाह के साथ-साथ एक मशहूर शायर के रूप में भी याद किया जाता है।
1857 की क्रांति में बने थे विद्रोह का चेहरा
बहादुर शाह जफर का नाम 1857 की क्रांति से भी जुड़ा है। उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों से सैनिकों और आम लोगों में नाराजगी बढ़ रही थी। नई राइफल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी इस्तेमाल किए जाने की अफवाहों ने सैनिकों के गुस्से को और बढ़ा दिया।
9 मई 1857 को मेरठ छावनी में सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। इसके बाद वे दिल्ली पहुंचे और 11 मई को बहादुर शाह जफर को हिंदुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया। उस समय उनकी उम्र करीब 82 साल थी। शुरुआत में वे इस विद्रोह का नेतृत्व करने को लेकर हिचकिचा रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने विद्रोहियों को अपना समर्थन दिया और आंदोलन का प्रतीक बन गए।
अंग्रेजों ने किया गिरफ्तार, बेटों की हुई हत्या
1857 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर दोबारा कब्जा कर लिया। इसके बाद 21 सितंबर 1857 को मेजर विलियम हॉडसन ने बहादुर शाह जफर को उनके परिवार के कुछ सदस्यों के साथ हुमायूं के मकबरे से गिरफ्तार कर लिया।
इसके अगले दिन हॉडसन ने जफर के बेटों मिर्जा मुगल और मिर्जा खिज्र सुल्तान के साथ उनके पोते मिर्जा अबू बक्र की हत्या कर दी। जिस जगह यह घटना हुई, उसे आज ‘खूनी दरवाजा’ के नाम से जाना जाता है। यह दिल्ली में मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के पास स्थित है।
रंगून में हुआ निधन, दिल्ली में दफन होने की थी इच्छा
गिरफ्तारी के बाद बहादुर शाह जफर पर लाल किले में मुकदमा चलाया गया। इसके बाद उन्हें ब्रिटिश शासन वाले बर्मा के रंगून निर्वासित कर दिया गया। वहीं 7 नवंबर 1862 को उनका निधन हो गया।
रंगून में रहते हुए जफर ने अपनी बेबसी और मातृभूमि से दूर होने का दर्द शायरी में बयां किया था। उनकी मशहूर पंक्तियां आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं—
कितना है बदनसीब 'जफर' दफ्न के लिए,
दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में।
इन पंक्तियों में उन्होंने अपनी मातृभूमि दिल्ली में दफन होने की इच्छा और उससे दूर रहने का दर्द जाहिर किया था। बहादुर शाह जफर का जीवन इस बात की याद दिलाता है कि समय के साथ बड़े से बड़े साम्राज्य भी खत्म हो जाते हैं।