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भारत ने पाकिस्तान के साथ हुई सिंधु जल संधि की निलंबित, दोनों देशों के लिए क्या हैं इसके मायने?

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले के जवाब में, राष्ट्रीय सुरक्षा पर देश की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था, सुरक्षा पर कैबिनेट समिति ने पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई का फैसला लिया। पहली बार भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से रोक दिया है। यानी अब इस संधि के मुताबिक भारत पाकिस्तान के साथ कोई जानकारी साझा नहीं करेगा और न ही इससे जुड़ी किसी बैठक में हिस्सा लेगा।

विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान ने नौ सालों की बातचीत के बाद सितंबर 1960 में सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। जल संधि पर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए। सिंधु नदी प्रणाली में मुख्य नदी सिंधु के साथ-साथ बाएं किनारे की इसकी पांच सहायक नदियां रावी, व्यास, सतलुज, झेलम और चिनाब हैं। 

संधि के मुताबिक, पूर्वी नदियों - सतलुज, ब्यास और रावी का पानी भारत को अप्रतिबंधित इस्तेमाल के लिए आवंटित किया गया है। तीनों नदियों का औसत सालाना प्रवाह लगभग 33 मिलियन एकड़ फीट है। पश्चिमी नदियों - सिंधु, झेलम और चिनाब  का ज्यादातर पानी पाकिस्तान को दिया जाता है। इनका औसत वार्षिक प्रवाह लगभग 135 मिलियन एकड़ फीट है।

हालांकि, दोनों देशों को सिंचाई और बिजली उत्पादन जैसे खास मकसद के लिए एक-दूसरे को सौंपी गई नदियों के सीमित इस्तेमाल की इजाजत है। संधि के मुताबिक सिंधु जल प्रणाली का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

जानकारों का कहना है कि संधि को निलंबित करने से भारत पर किशनगंगा जलाशय के 'जलाशय फ्लशिंग' और जम्मू कश्मीर में पश्चिमी नदियों पर दूसरी परियोजनाओं पर प्रतिबंधों का पालन करने की कोई जिम्मेदारी नहीं है। फ्लशिंग से जलाशयों से गाद निकालने में मदद मिलती है, लेकिन उन्हें दोबारा भरने में कई दिन लग जाते हैं।

सिंधु जल संधि के तहत फ्लशिंग के बाद जलाशय को भरने का काम अगस्त में किया जाना होता है। इस दौरान मानसून चरम पर होता है। हालांकि संधि स्थगित होने की वजह से ये काम अब कभी भी किया जा सकता है। संधि के मुताबिक सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर डिज़ाइन प्रतिबंध लागू है। इन पर बांध जैसी संरचनाओं का निर्माण नहीं किया जा सकता। बीते वक्त में लगभग हर परियोजना पर पाकिस्तान की तरफ से आपत्ति जताई गई है। हो सकता है कि आपत्तियां अब नई परियोजनाओं पर लागू न हों।

भारत नदियों पर बाढ़ के आंकड़े साझा करना भी बंद कर सकता है। ये पाकिस्तान के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता है। खास तौर पर मानसून के दौरान जब नदियां उफान पर होती हैं। जानकारों के मुताबिक, भारत को अब पश्चिमी नदियों खासकर झेलम पर जल भंडारण पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा। साथ ही घाटी में बाढ़ को कम करने के लिए अनेक बाढ़ नियंत्रण उपाय भी कर सकेगा।