नयी दिल्ली, 19 अक्टूबर (भाषा) कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक हत्या के एक दोषी की सजा पर रोक लगाये जाने और कॉजपा के सह-संयोजकों आशुतोष रांका एवं सौरव दास की न्यायिक हिरासत दो दिन बढ़ाए जाने को लेकर सोमवार को सवाल उठाए।
दीपके ने दो खबर के स्क्रीनशॉट ‘एक्स’ पर साझा किए, इनमें से एक का शीर्षक है, ‘‘भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक हत्या के दोषी की सजा पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लगाई रोक’’।
दूसरी खबर में रांका और दास की न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने की जानकारी थी।
संबंधित खबरों के अनुसार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नंदलाल राय उर्फ बबलू राय की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा पर रोक लगा दी है। राय को 2017 के एक हत्या के मामले में पिछले साल दोषी करार दिया गया था।
खबर के मुताबिक, राय ने अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में या संभव होने पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी।
उच्च न्यायालय ने इसके बाद राय की दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाई है।
अदालत ने कहा कि एक आम व्यक्ति के आजीविका के अधिकार का महत्व किसी राजनीतिक नेता के चुनाव लड़ने के अधिकार से कम नहीं है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि अपील पर अंतिम फैसला आने तक दोषी के जीवनयापन को संभव बनाने के लिए उसकी दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाई जानी चाहिए।
दोषसिद्धि के खिलाफ अपील अभी लंबित है।
दीपके ने एक अन्य पोस्ट में रांका और दास के त्याग का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने देश को बेहतर बनाने की उम्मीद में अपने सफल करियर और आर्थिक सुरक्षा को छोड़ दिया है।
उन्होंने कहा, “कुछ साल पहले आशुतोष (आशु) लंदन में एक बड़ी कंपनी में अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी करते थे और लाखों रुपये कमाते थे। सौरव देश की कानून व्यवस्था के बारे में लिख रहे थे और एक अच्छी जिंदगी जी रहे थे। दोनों का करियर सफल था, वे आर्थिक रूप से संपन्न थे और उनके पास अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाने के तमाम कारण थे।”
दीपके ने कहा, “लेकिन उन्होंने देश को बेहतर बनाने की उम्मीद में सब कुछ छोड़ने का फैसला किया। उनके पास अपनी आरामदायक जिंदगी छोड़ने, सड़क पर उतरने, अनिश्चितताओं का सामना करने और आखिरकार जेल जाने का कोई कारण नहीं था। फिर भी उन्होंने ऐसा किया।”
उन्होंने कहा कि रांका और दास की सबसे खास बात यह है कि अच्छी पृष्ठभूमि से आने के बावजूद उन्होंने उन लोगों के लिए लड़ने का फैसला किया, जो उनसे कम सौभाग्यशाली हैं।
दीपके ने कहा, “वे आसानी से इन सब चीजों से मुंह मोड़ सकते थे, अपनी जिंदगी का आनंद ले सकते थे और उन लोगों के संघर्षों की परवाह किए बिना रह सकते थे, जिनसे वे कभी मिले तक नहीं थे। किसी ने उनसे ये त्याग करने को नहीं कहा था और न ही किसी को उनसे ऐसी उम्मीद थी। लेकिन उन्होंने ऐसा किया, क्योंकि वे वास्तव में अपनी नहीं, बल्कि अन्य लोगों की चिंता करते हैं।”
कॉजपा के विधि प्रकोष्ठ की प्रमुख रत्ना सिंह ने भी इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “मैंने अपनी पूरी जिंदगी में इससे ज्यादा बेतुकी चीज कभी नहीं देखी।”
सिंह ने बाद में, पत्रकारों से बातचीत में विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (एसईएम) की अदालत में हो रही कार्यवाही के बारे में कहा कि यह ‘‘किसी सर्कस से कम नहीं’’ है।
उन्होंने दावा किया कि रांका और दास को हिरासत में रखने के लिए कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है।
सिंह ने कहा, “एसईएम अदालत को समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि उसकी निष्पक्षता से समझौता हो चुका है।”
उन्होंने रांका और दास की ओर से पेश किए गए जमानतदारों की गारंटी को अस्वीकार किए जाने पर भी सवाल उठाए।
कॉजपा ने आरोप लगाया है कि उसके दो सह-संयोजकों की रिहाई को रोकने के लिए जमानत की कार्यवाही में जानबूझकर देरी की गई।
रविवार को, उनकी जमानत मामले की सुनवाई कर रहे विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने दावा किया था कि कुछ अज्ञात लोग उन्हें धमकी दे रहे हैं, जिसके बाद पुलिस ने एक गैर-संज्ञेय रिपोर्ट दर्ज की।
सूत्रों के मुताबिक, रांका और दास को बुधवार को फिर से विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा।
भाषा जितेंद्र सुभाष
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