नयी दिल्ली, 19 अक्टूबर (भाषा) विभिन्न देशों के विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले भारतीय मूल के 400 से अधिक छात्रों, शोधकर्ताओं और पूर्व विद्यार्थियों ने निर्वाचन आयोग के खिलाफ विपक्षी दलों के प्रदर्शनों की आलोचना की है। उन्होंने इन प्रदर्शनों को संवैधानिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को कमजोर करने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की वैधता पर सवाल उठाने की कोशिश बताया है।
‘‘भारत को अराजकता से बचाएं’’ शीर्षक वाले संयुक्त बयान में 27 देशों के विश्वविद्यालयों से जुड़े या पूर्व छात्र रह चुके हस्ताक्षरकर्ताओं ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को चुनौती देने के लिए ‘‘सड़कों पर अराजक प्रदर्शनों’’ की आलोचना की और चेतावनी दी कि संवैधानिक लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर उसे ही कमजोर न किया जाए।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल निर्वाचन आयोग के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। विपक्षी नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं और चुनावों में गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं।
बयान में कहा गया है, ‘‘भारतीय लोकतंत्र में संदेह के बीज बोने की एक बेहद अनुचित और कुटिल साजिश रची गई है। इसके लिए अदालत में विचाराधीन मामलों को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, और फिर अराजकतावादी ताकतों का सहारा लेकर इसे सड़कों पर और हवा दी जा रही है। ये ताकतें ऐतिहासिक और वैचारिक रूप से कभी भी संवैधानिक शासन व्यवस्था में विश्वास नहीं रखतीं। और यह सब लोकतंत्र को बचाने के नाम पर किया जा रहा है।’’
इसमें कहा गया, ‘‘हम इस पूरी स्थिति के विरोधाभास को देखकर हैरान हैं। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि देश के भविष्य से सरोकार रखने वाले जागरूक नागरिकों के रूप में और दुनिया भर में ‘भारतीय’ के रूप में अपनी पहचान रखने वाले लोगों के तौर पर हम मौजूदा हालात से बेहद दुखी हैं।’’
हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र ने बार-बार अपनी मजबूती साबित की है और पर्याप्त नियंत्रण एवं संतुलन वाली व्यवस्था के तहत संवैधानिक संस्थाएं फलती-फूलती रही हैं।
बयान में कहा गया, ‘‘आजादी के बाद के सात दशकों में भारतीय लोकतंत्र ने बार-बार अपनी मजबूती साबित की है। संस्थाओं ने प्रगति की है, नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था ने सराहनीय ढंग से काम किया है और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण भारतीय लोकतंत्र की एक स्थायी पहचान बना रहा है।’’
इसमें अफसोस जताया गया कि कुछ हलकों में ‘‘चुनाव नतीजों को न मानने की सनक, संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार सवाल उठाना, और 'संसद के बजाय सड़क' को तरजीह देने’’ का चलन हावी हो गया है।
उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक ताकतों से आग्रह किया कि वे संवैधानिक संस्थाओं के दायरे में रहकर ‘‘बहस, चर्चा, संवाद और असहमति’’ के जरिए अपने मतभेदों को सुलझाएं।
हस्ताक्षरकर्ता अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान और सिंगापुर सहित 27 देशों में स्थित विश्वविद्यालयों से जुड़े हैं या वहां पढ़ाई कर चुके हैं। इन संस्थानों में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी), ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, हार्वर्ड विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स आदि शामिल हैं।
बयान में स्पष्ट किया गया कि इन संस्थानों से जुड़ाव का यह मतलब नहीं है कि संबंधित विश्वविद्यालयों ने भी इस बयान का समर्थन किया है।
भाषा आशीष अविनाश
अविनाश