(बिजय कुमार सिंह)
नयी दिल्ली, 19 अक्टूबर (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर डी. सुब्बाराव ने सोमवार को कहा कि रुपये की कमजोरी के लिए केवल ईरान संघर्ष तथा कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को जिम्मेदार ठहराना और यह मान लेना कि स्थिति सामान्य होने पर रुपया फिर मजबूत हो जाएगा, गलत आकलन होगा।
उन्होंने कहा कि तेल की कीमतें एक महत्वपूर्ण कारक हैं, लेकिन पिछले कुछ साल से रुपये पर दबाव बना हुआ है। इसकी वजह विदेशी पूंजी की निरंतर निकासी है जो घरेलू और वैश्विक दोनों कारकों को दर्शाती है।
सुब्बाराव ने पीटीआई-भाषा’ के साथ साक्षात्कार में कहा, ‘‘ रुपये की कमजोरी को पूरी तरह से ईरान के संघर्ष और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से जोड़ना और यह मान लेना कि हालात सामान्य होने पर सब कुछ ठीक हो जाएगा...यह सोचने में अच्छा लग सकता है लेकिन मुझे लगता है कि यह समस्या का गलत आकलन होगा।’’
घरेलू शेयर बाजारों में भारी गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों में फिर तेजी के कारण रुपया सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले तीन पैसे टूटकर 94.92 (अस्थायी) पर रहा।
घरेलू स्थिति पर सुब्बाराव ने कहा कि भारतीयों की ओर से शेयर और म्यूचुअल फंड में मजबूत निवेश से बाजार को समर्थन मिला है, लेकिन इससे शेयरों का मूल्यांकन भी बढ़ गया है।
उन्होंने कहा, ‘‘विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक, जो विभिन्न बाजारों में मिलने वाले ‘रिटर्न’ की तुलना करते हैं, उन्हें मौजूदा मूल्यांकन पर भारतीय परिसंपत्तियों में तेजी की सीमित गुंजाइश दिख रही है। दूसरे बाजारों की तुलना में भारत महंगा बाजार बन गया है।’’
वैश्विक कारकों के महत्व पर जोर देते हुए सुब्बाराव ने कहा कि पूंजी उन अर्थव्यवस्थाओं और क्षेत्रों की ओर जा रही है, जो प्रौद्योगिकी में अग्रणी हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘कृत्रिम मेधा (एआई) में तेजी (खासकर अमेरिका की बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों में) ने बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित किया है।’’
पूर्व गवर्नर ने कहा कि निवेशक सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी, उन्नत विनिर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में भी अवसर तलाश रहे हैं। इस क्षेत्र में अमेरिका, ताइवान और चीन आगे हैं।
उन्होंने कहा कि यह वैश्विक पूंजी आवंटन में बदलाव को दर्शाता है। निवेशक अब केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी में अग्रणी होने और उससे मिलने वाले ‘रिटर्न’ पर भी ध्यान दे रहे हैं।
सुब्बाराव ने कहा, ‘‘भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन कई नई और उन्नत प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में उसकी भूमिका अब भी सीमित है।’’
वर्ष 2008 से 2013 तक आरबीआई गवर्नर रहे सुब्बाराव ने कहा कि इससे यह सबक मिलता है कि केवल मजबूत आर्थिक वृद्धि से विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ने या रुपया मजबूत होने की गारंटी नहीं मिलती।
उन्होंने कहा, ‘‘हमें उत्पादकता बढ़ाकर, निर्यात प्रतिस्पर्धी क्षमता मजबूत करके, लेनदेन की अनावश्यक लागत और नीतिगत अनिश्चितता कम करके तथा उन्नत प्रौद्योगिकियों में क्षमता विकसित करके भारतीय परिसंपत्तियों को अधिक आकर्षक बनाना होगा। हमें चालू खाते और पूंजी खाते, दोनों पर काम करना होगा।’’
आरबीआई की ओर से हाल में रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी को उचित ठहराए जाने के सवाल पर सुब्बाराव ने कहा कि केंद्रीय बैंक के फैसले को उसके सामने मौजूद कठिन विकल्पों के संदर्भ में देखना चाहिए। आरबीआई का प्राथमिक दायित्व कीमतों को स्थिर रखना है, लेकिन वह आर्थिक वृद्धि और वित्तीय स्थिरता की अनदेखी भी नहीं कर सकता। मौजूदा स्थिति में जटिलता यह है कि महंगाई का दबाव मुख्य रूप से आपूर्ति संबंधी झटकों (कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और प्रतिकूल मानसून) से पैदा हो रहा है।
आरबीआई की विदेशी मुद्रा प्रवासी (एफसीएनआर) योजना के बारे में पूछे जाने पर सुब्बाराव ने कहा कि बाजार में अस्थिरता बढ़ाने वाली धारणा का मुकाबला करने के लिए इस योजना को आपात उपाय के रूप में उचित ठहराया जा सकता है। हालांकि, केवल बड़ी राशि जुटाना इसकी सफलता का प्रमाण नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘‘हमें ऐसे निवेश प्रवाह की जरूरत है जो लगातार बने रहें और जिन्हें भारत की आर्थिक संभावनाओं पर भरोसे, मजबूत निर्यात तथा आयातित ऊर्जा पर कम निर्भरता का समर्थन मिले।’’
भाषा निहारिका अजय
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