अमरावती, 19 अक्टूबर (भाषा) मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) के चयन के लिए 2023 में लाए गए कानून का समर्थन करने को लेकर वाईएसआरसीपी प्रमुख वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी के खेद जताने पर तेदेपा और भाजपा ने सोमवार को पलटवार किया।
आंध्र प्रदेश की सत्तारूढ़ तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) ने जहां ‘राजनीतिक सुविधा’ का विकल्प अपनाने को लेकर रेड्डी की आलोचना की, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उनके रुख में आए अचानक बदलाव पर सवाल उठाए।
रेड्डी ने रविवार को संवाददाता सम्मेलन में कहा था, ‘‘हम उस प्रक्रिया का समर्थन करने पर खेद व्यक्त करते हैं, जिसके तहत केंद्र में सत्ताधारी दल मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) को नामित करता है... न तो सीईसी और न ही राज्य निर्वाचन आुयक्त (एसईसी) की नियुक्ति सत्ताधारी दल द्वारा की जानी चाहिए।’’
चयन प्रक्रिया की तुलना एक परीक्षा से करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘परीक्षक को छात्र द्वारा नियुक्त नहीं किया जा सकता।’’
उन्होंने कहा कि अगर नियुक्ति किसी निष्पक्ष संस्था द्वारा नहीं की जाती है, तो एक ईमानदार निर्वाचन आयुक्त को भी आलोचना का सामना करना पड़ेगा।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि चयन समिति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) शामिल होने चाहिए, और इन तीनों को अपने मतदान के अधिकार का उपयोग करना चाहिए।
रेड्डी कहा कि मौजूदा कानून के तहत, प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के पास दो वोट होते हैं, जबकि नेता प्रतिपक्ष के पास एक वोट होता है।
उन्होंने कहा कि वाईएसआरसीपी को कानून का समर्थन करने के बाद अपनी ‘‘गलती’’ का एहसास हो गया था।
राज्य निर्वाचन आयुक्तों (एसईसी) के लिए भी इसी तरह के सुधारों का सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी नियुक्ति मुख्यमंत्रियों या सत्ताधारी दलों द्वारा नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष प्राधिकार द्वारा की जानी चाहिए।
इन टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए, तेदेपा नेता एन. विजय कुमार ने जगन पर ‘‘राजनीतिक सुविधा’’ का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि सत्ता में रहते हुए वाईएसआरसीपी ने इस कानून का समर्थन किया था, लेकिन चुनाव हारने के बाद अब वे चयन प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।
उन्होंने 2019 से 2024 के बीच पिछली वाईएसआरसीपी सरकार के दौरान, राज्य निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को लेकर रेड्डी के रिकॉर्ड पर भी सवाल उठाए।
कुमार ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता पर जगन की टिप्पणियां राजनीतिक सुविधा से प्रेरित हैं। सत्ता में रहते हुए वाईएसआरसीपी ने इस कानून का समर्थन किया था, लेकिन चुनाव हारने के बाद अब वे इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।’’
उनके अनुसार, वाईएसआरसीपी सरकार ने अपने कार्यकाल में तत्कालीन एसईसी एन. रमेश कुमार को हटाने के लिए एक अध्यादेश पेश किया था। इसके बाद, सरकार ने सेवानिवृत्त मुख्य सचिव नीलम साहनी को नियुक्त किया, जो रेड्डी की राजनीतिक सलाहकार रह चुकी थीं। यह नियुक्ति राज्य के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष एवं तेदेपा प्रमुख एन. चंद्रबाबू नायडू से परामर्श किए बिना की गई थी।
उन्होंने कहा कि जिस नेता ने राज्य में चुनाव तंत्र को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की थी, उसे दूसरों को लोकतांत्रिक पारदर्शिता के बारे में उपदेश देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
भाजपा नेता बी. विनूषा रेड्डी ने भी जगन के रुख में आए बदलाव पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि केंद्र में दशकों तक सत्ता में रहने के दौरान कांग्रेस ने ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया, जिसमें प्रधान न्यायाधीश को शामिल करने वाली एक चयन समिति का प्रावधान हो?
उन्होंने यह भी पूछा कि आंध्र प्रदेश में रेड्डी के पिता, दिवंगत मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल के दौरान ऐसा कानून क्यों नहीं लाया गया?
विनूषा रेड्डी ने पूछा, ‘‘वाईएसआरसीपी ने संसद में 2023 के कानून का समर्थन क्यों किया और अब पछतावा क्यों जता रही है? क्या रुख में यह बदलाव राजनीतिक हालात की वजह से आया है?’’
भाजपा नेता ने पीटीआई-भाषा से कहा कि संसद ने कानून पारित करते समय अपने विधायी अधिकार का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा कि इस कानून में एक चयन समिति का प्रावधान है, जिसमें प्रधान न्यायाधीश के बजाय, प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होंगे।
भाषा
नेत्रपाल मनीषा
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