बेंगलुरु, 17 अक्टूबर (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों से न्याय एवं स्वतंत्रता की रक्षा करने और संवैधानिक मूल्यों को लेकर प्रतिबद्ध रहने का आह्वान करते हुए शनिवार को कहा कि कानूनी पेशा अपनाने वालों में साहस, ईमानदारी और उन लोगों की बात सुनने की क्षमता होनी चाहिए जिनकी आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने यहां ‘नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी’ (एनएलएसआईयू) के 34वें वार्षिक दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि कानूनी शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों को अलग-अलग विचारों को समझने और समाज की सेवा करने के लिए भी तैयार किया जाना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘कानूनी शिक्षा का उद्देश्य केवल आपराधिक या संवैधानिक कानून के सिद्धांतों को सीखना नहीं है, बल्कि ऐसे लोगों से मिलने और उनके विचारों को समझने का अनुभव हासिल करना भी है, जो दुनिया को हमसे अलग नजरिए से देखते हैं।’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कानूनी पेशे की जिम्मेदारियों का जिक्र करते हुए कहा कि इसके लिए केवल कानूनों और अदालतों के पुराने फैसलों की जानकारी होना ही काफी नहीं है, बल्कि न्याय के पक्ष में खड़े होने का साहस और उन लोगों की चिंताओं को सुनने की विनम्रता भी जरूरी है, जिनकी आवाज को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
उन्होंने कहा, ‘‘वकालत का पेशा कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। इसमें केवल कानूनों और अदालतों के पुराने फैसलों की गहरी समझ ही नहीं, बल्कि जो सही है उसके पक्ष में खड़े होने का साहस और अक्सर अनसुने रह जाने वाले लोगों की बात सुनने के लिए विनम्रता भी जरूरी है।’’
प्रधान न्यायाधीश ने स्वतंत्र सोच और निष्पक्षता के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले अलग-अलग विचारों को सुनें और जिनसे असहमत हों, उनकी गरिमा का भी सम्मान करें।
उन्होंने कहा कि बौद्धिक स्वतंत्रता के लिए निष्पक्षता भी जरूरी है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि कानून हमेशा एक जैसा नहीं रहता, बल्कि इस पेशे से जुड़े लोगों की सोच और उनके काम से उसमें बदलाव आता है। उन्होंने कहा कि अदालत में लड़े जाने वाले हर मामले, तैयार किए जाने वाले हर अनुबंध, दी जाने वाली हर कानूनी सलाह और लिखे जाने वाले हर फैसले का देश की न्याय व्यवस्था को विकसित करने में योगदान होता है।
प्रधान न्यायाधीश ने विद्यार्थियों को आगाह किया कि वे अपनी सुविधा के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता न करें और पेशेवर जीवन में सफलता पाने के लिए आसान रास्ते न अपनाएं।
उन्होंने छात्रों से कहा कि वे इस संस्थान में सीखे गए मूल्यों को हमेशा अपने जीवन में बनाए रखें और उन्हीं के अनुसार काम करें।
उन्होंने कहा, ‘‘ईमानदारी के रास्ते पर लगातार चलते रहने से ही पेशेवर जीवन में आपकी प्रतिष्ठा बनेगी। ऐसे मौके आएंगे जब आपको समझौता करना आसान लगेगा, अपना काम निकालने के लिए सिद्धांतों से हटने का मन करेगा या दूसरे लोग आसानी से सफलता पाने के लिए छोटे रास्ते अपनाते दिखेंगे। ऐसे समय में इस संस्थान से मिली सीख को अपना मार्गदर्शक बनाएं और यहां सीखे गए मूल्यों पर कायम रहें।’’
कानूनी पेशे के जरिए समाज की सेवा करने से मिलने वाले संतोष का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वकीलों को अन्याय दूर करने, लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने और संविधान के मूल्यों को बनाए रखने से संतुष्टि मिल सकती है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘जब आप इस परिसर से बाहर निकलेंगे तो केवल एक पेशे में कदम नहीं रखेंगे, बल्कि आपके कंधों पर लोगों के अधिकारों की रक्षा करने और उनकी सेवा करने की जिम्मेदारी भी होगी।’’
उन्होंने कहा कि कानूनी पेशा छात्रों के धैर्य और नैतिक मूल्यों की परीक्षा लेगा, लेकिन उन्हें अन्याय दूर करने, स्वतंत्रता की रक्षा करने और संविधान को सर्वोपरि रखने का संतोष भी देगा।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने विद्यार्थियों की सफलता में उनके माता-पिता, शिक्षकों और कर्मचारियों के योगदान को कभी सराहा।
भाषा सिम्मी देवेंद्र
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