मुंबई, 16 अक्टूबर (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को महाराष्ट्र विशेष जनसुरक्षा कानून (एमएसपीएसए) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के ‘‘वाद दायर करने के अधिकार’’ पर सवाल उठाए।
मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित संगठनों का प्रतिनिधित्व करने की पात्रता साबित करने वाले दस्तावेज जमा करने का निर्देश दिया।
कांग्रेस, भाकपा और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कानून की वैधता को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की थीं। उनका दावा है कि यह कानून ‘‘संविधान द्वारा संरक्षित शांतिपूर्ण और वैध असहमति को दबाने’’ वाला होगा।
इस कानून का उद्देश्य वामपंथी उग्रवादी संगठनों या इसी तरह के अन्य संगठनों की ‘‘गैरकानूनी गतिविधियों’’ को रोकना है। यह कानून राज्य सरकार को किसी भी संदिग्ध संगठन को ‘‘गैरकानूनी संगठन’’ घोषित करने का अधिकार भी देता है।
अदालत ने शुक्रवार को याचिकाकर्ताओं और उनके द्वारा प्रतिनिधित्व किए जा रहे संगठनों का विवरण मांगा। पीठ ने उनसे पंजीकरण प्रमाणपत्र, पदाधिकारियों के नाम और संगठनों के संविधान प्रस्तुत करने को कहा।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हम यह देखना चाहते हैं कि आप किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।’’
पीठ ने संकेत दिया कि आवश्यक दस्तावेजों के बिना वह याचिकाओं के गुण-दोष पर विचार नहीं करेगी।
एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नवरोज सीरवई ने दलील दी कि वैध लोकतांत्रिक गतिविधियों और असहमति को निशाना बनाने के लिए ‘शहरी नक्सलवाद’ शब्द की आड़ ली जा रही है।
उन्होंने कहा कि कानून के प्रावधान कठोर हैं और इससे बैठकें आयोजित करने या अपने विचार व्यक्त करने की कोशिश करने वाले लोगों में भय पैदा हो सकता है।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध की।
भाषा शफीक अविनाश
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