नयी दिल्ली, 16 अक्टूबर (भाषा) कैंसर से संबंधित 33,159 शोध लेखों के विश्लेषण में चार हजार से अधिक लेखों में फर्जी उद्धरणों के दिए जाने के स्पष्ट संकेत मिले हैं। ये लेख कथित तौर पर उन संस्थाओं से जुड़े हैं जो धोखाधड़ी के जरिए शोध पत्र तैयार करती हैं और फिर इसे दूसरों के नाम से प्रकाशित कराके पैसे कमाती हैं।
‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, संदिग्ध शोध पत्रों को प्रकाशित होने के एक से तीन साल के भीतर अन्य लेखों की तुलना में 50 से 100 प्रतिशत अधिक उद्धरण मिले। हालांकि, इन्हें पढ़ने वालों की संख्या कम थी और इन्हें ऑनलाइन भी कम बार देखा गया।
शोधकर्ताओं ने कहा कि संदिग्ध शोध पत्र कुछ चुनिंदा पत्रिकाओं में अधिक संख्या में पाए गए। इनमें ‘जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल एंड क्लिनिकल कैंसर रिसर्च’ और ‘मॉलिक्यूलर कैंसर’ शामिल हैं, जबकि अन्य पत्रिकाओं पर इसका असर बहुत कम था।
उन्होंने कहा कि फर्जी शोध पत्र तैयार करने वाली संस्थाएं लोगों के नाम फर्जी शोध पत्रों में शामिल करने के बदले पैसे कमाती हैं। ये संस्थाएं उद्धरणों की संख्या में भी हेरफेर कर सकती हैं, जो अकादमिक प्रदर्शन को मापने का एक प्रमुख पैमाना है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, उद्धरणों की संख्या को कृत्रिम रूप से बढ़ाने से वैज्ञानिक साक्ष्यों का आधार विकृत होता है। इससे भविष्य के शोध और चिकित्सा क्षेत्र में शोध के इस्तेमाल को लेकर गलत जानकारी फैल सकती है।
ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के ऑस्ट्रेलियन सेंटर फॉर हेल्थ सर्विसेज इनोवेशन के लेखक एवं सांख्यिकीविद एड्रियन बार्नेट ने कहा, “जिस तरह सोशल मीडिया पर ‘लाइक’ और ‘शेयर’ से किसी प्रभावशाली व्यक्ति के प्रति दर्शकों की प्रतिक्रिया का पता चलता है, उसी तरह अन्य शोधकर्ताओं द्वारा उद्धरण देना वैज्ञानिकों के शोध के प्रभाव का आकलन करने का एक महत्वपूर्ण अकादमिक पैमाना है।”
बार्नेट ने कहा कि चूंकि उद्धरणों की संख्या अब अकादमिक प्रदर्शन का एक प्रमुख पैमाना बन गई है, इसलिए इससे पत्रिकाओं और शोधकर्ताओं को उद्धरणों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।
उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं ने ऐसे पैटर्न दर्ज किए हैं जो फर्जी शोध पत्र तैयार करने वाली संस्थाओं द्वारा उद्धरणों की संख्या में व्यापक और समन्वित हेरफेर की ओर संकेत करते हैं।
बार्नेट ने कहा, “उद्धरणों की कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई दर से पत्रिकाओं का प्रभाव कारक बढ़ सकता है, अविश्वसनीय निष्कर्षों को बढ़ावा मिल सकता है और वैज्ञानिक प्रगति धीमी हो सकती है।”
शोधकर्ताओं ने 2012 से 2023 के बीच 20 पत्रिकाओं में प्रकाशित 33,159 लेखों में उद्धरणों के पैटर्न पर ऐसी संस्थाओं के प्रभाव का आकलन किया।
सह-शोधकर्ता बैप्टिस्ट स्कैनकार ने कहा, “पहले विकसित किए गए अपने पहचान मॉडल का इस्तेमाल करते हुए हमने 4,085 लेखों को संभावित रूप से ऐसी संस्थाओं से जुड़ा पाया। यह पहचान वापस लिए जा चुके ऐसे शोध पत्रों के शीर्षकों और सारांशों से उनकी पाठ्य समानता के आधार पर की गई।”
शोधकर्ताओं ने कहा कि मॉडल के आधार पर चिह्नित लेखों को अन्य लेखों की तुलना में कहीं अधिक उद्धरण मिले, लेकिन उन्हें पढ़ने वालों की संख्या कम थी।
स्कैनकार ने कहा, “अधिक उद्धरण मिलना, लेकिन पाठकों की संख्या कम होना समझ से परे है, क्योंकि उद्धरण पाठकों से ही मिलते हैं।”
उन्होंने कहा कि चिह्नित शोध पत्रों में अधिकतर एक-दूसरे का उद्धरण देते हैं या एक-दूसरे के शोध पत्रों में उद्धृत होते हैं। इससे कैंसर शोध से जुड़ी कुछ पत्रिकाओं के उद्धरण संबंधी आंकड़े कृत्रिम रूप से बढ़ जाते हैं।
स्कैनकार ने कहा कि चिह्नित लेख कुछ चुनिंदा पत्रिकाओं में अधिक संख्या में पाए गए, जबकि अन्य पत्रिकाएं इससे बहुत कम प्रभावित हुईं।
शोधकर्ताओं ने कहा कि उनके निष्कर्ष उद्धरणों में हेरफेर के ऐसे पैटर्न की पहचान करने के लिए शोध लेखों और पत्रिकाओं की जांच किए जाने का समर्थन करते हैं।
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