(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, 14 अक्टूबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें दिल्ली पुलिस को उसकी हिरासत में कथित तौर पर आत्महत्या करने वाले एक व्यक्ति के परिजनों को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने दिल्ली पुलिस की याचिका मंजूर कर ली। पुलिस ने अपनी याचिका में आयोग द्वारा 19 अप्रैल, 2024 को जारी किये गये आदेश को चुनौती दी थी।
उच्च न्यायालय ने 12 अक्टूबर को अपने आदेश में कहा, ‘‘प्रतिवादी नंबर एक (एनएचआरसी) के सामने कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है और दलीलों को देखते हुए... पुलिस अधिकारियों की ओर से मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने में लापरवाही के आधार पर पांच लाख रुपये का मौद्रिक मुआवज़ा देने की प्रतिवादी नंबर एक की सिफ़ारिश को बरकरार नहीं रखा जा सकता।’’
उच्च न्यायालय ने कहा,‘‘इसलिए, उपरोक्त बातों और मामले के खास तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, मौजूदा याचिका स्वीकार की जाती है और विवादित आदेश को रद्द किया जाता है।’’
यह आदेश बुधवार को उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया।
उच्च न्यायालय ने कहा कि आयोग का आदेश राशिद रजा की मौत से जुड़ा है, जो दिसंबर 2019 में नरेला औद्योगिक क्षेत्र में एक थाने के एक कमरे में फंदे से लटका मिला था।
एनएचआरसी आदेश में कहा गया कि वह व्यक्ति पुलिस हिरासत में था और उसे किसी भी तरह के नुकसान से बचाना पुलिस की ज़िम्मेदारी थी। आयोग के आदेश में कहा गया कि अगर पुलिस सतर्क रहती, तो आत्महत्या को रोका जा सकता था।
लेकिन उच्च न्यायालय ने माना कि पुलिस अधिकारियों की लापरवाही का अंदाज़ा लगाने के लिए कोई स्वतंत्र आधार नहीं था।
उच्च न्यायालय ने कहा,‘‘मौत बहुत दुखद है, लेकिन इससे अपने-आप लापरवाही का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। मौत की जगह एक अहम बात ज़रूर है, लेकिन ज़िम्मेदारी तय करने के लिए सिर्फ़ यही एक आधार नहीं होना चाहिए।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि उपजिलाधिकारी (एसडीएम) की जांच रिपोर्ट के मुताबिक थाने में हाथापाई या उत्पीड़न का कोई सबूत नहीं मिला।
उच्च न्यायालय ने कहा कि सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि उस व्यक्ति की आवाजाही पर कोई रोक-टोक नहीं थी और इससे यह भी संकेत मिलता है कि यह घटना शायद तब हुई होगी जब पुलिस के पास दखल देने का कोई उचित मौका नहीं था।
भाषा
राजकुमार रंजन
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