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एनआईटी राउरकेला ने पेयजल से फ्लोराइड हटाने के लिए कटहल के छिलके से बनाई सामग्री, पेटेंट कराया

नयी दिल्ली, 14 अक्टूबर (भाषा) राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), राउरकेला के शोधकर्ताओं ने कटहल के छिलके से विकसित कम लागत वाली एक सामग्री का पेटेंट कराया है, जो दूषित भूजल से अतिरिक्त फ्लोराइड को हटाने में मदद करेगी।

एनआईटी राउरकेला के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग की प्रोफेसर सुस्मिता मिश्रा के अनुसार, कटहल के छिलके से बने सक्रिय कार्बन में जिरकोनियम मिलाकर उसकी फ्लोराइड सोखने की क्षमता बढ़ा यह सामग्री तैयार की गई। पेटेंट प्राप्त यह सामग्री पेयजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा की समस्या से जूझ रहे देशभर के समुदायों के लिए एक कारगर विकल्प साबित हो सकती है।

देश के कई हिस्सों में भूजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा पाई गई है। ऐसे में पानी को कम खर्च में साफ करना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता बन गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पेयजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकती है। इससे बच्चों और वयस्कों, दोनों में दांतों और हड्डियों से जुड़ा फ्लोरोसिस रोग हो सकता है।

संस्थान के एक बयान में मिश्रा के हवाले से कहा गया, “इस तकनीक का मुख्य विचार खेती से निकलने वाले कचरे का इस्तेमाल पानी साफ करने के लिए करना है। हमने फेंक दिए जाने वाले कटहल के छिलकों से सक्रिय कार्बन तैयार किया और पानी से फ्लोराइड को बेहतर तरीके से सोखने के लिए उसमें जिरकोनियम मिलाया।”

उन्होंने कहा, “प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में इस सामग्री ने अच्छे परिणाम दिखाए। परीक्षण की गई परिस्थितियों में इसने लगभग 10 मिनट के भीतर 90 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटा दिया।”

भूजल से फ्लोराइड हटाने के कई पारंपरिक तरीके हैं, लेकिन बड़े स्तर पर उनका इस्तेमाल करने में कुछ समस्याएं हैं। उदाहरण के लिए, रिवर्स ऑस्मोसिस विधि में पानी साफ करने की प्रक्रिया के दौरान काफी मात्रा में पानी बर्बाद हो जाता है। इसके अलावा, यह साफ किए गए पानी से कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे लाभकारी खनिज भी हटा देती है।

दूसरी ओर, आयन एक्सचेंज और सक्रिय एल्यूमिना जैसी प्रक्रियाओं में तेज रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे ये पर्यावरण के अनुकूल नहीं हैं।

इन समस्याओं को दूर करने के लिए एनआईटी राउरकेला की शोध टीम ने फेंक दिए जाने वाले कटहल के छिलकों को सक्रिय कार्बन में बदला।

मिश्रा ने बताया कि इस तकनीक की खासियत यह है कि इसमें आसानी से उपलब्ध कृषि उप-उत्पाद का इस्तेमाल करके फ्लोराइड हटाने वाली कम लागत की सामग्री तैयार की जा सकती है।

उन्होंने कहा, “लंबे समय में, आगे के परीक्षणों और पुष्टि के बाद यह तकनीक उन क्षेत्रों के समुदायों के लिए पानी साफ करने के समाधान विकसित करने में मदद कर सकती है, जहां फ्लोराइड की समस्या है।”

एनआईटी राउरकेला की शोध स्नातक और पेटेंट की सह-मालिक प्रतिमा मिंज ने बताया कि प्रयोगशाला स्तर पर किए गए परीक्षणों में विकसित सामग्री ने प्रति लीटर पानी में लगभग 1 से 5 मिलीग्राम फ्लोराइड की मात्रा होने पर करीब 10 मिनट में 90 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटा दिया।

मिंज ने कहा, “परीक्षण की गई परिस्थितियों में हमने 10 से 20 मिनट के भीतर 90 से 97 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटाने की क्षमता दर्ज की। ये परिणाम बताते हैं कि इस सामग्री का इस्तेमाल पीने के पानी को साफ करने में किया जा सकता है। इसमें वे क्षेत्र भी शामिल हैं, जहां भूजल में फ्लोराइड का स्तर चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा, “खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, जहां पानी साफ करने की भरोसेमंद व्यवस्था सीमित है, यह तकनीक समुदाय स्तर पर स्थानीय रूप से पानी साफ करने की व्यवस्था विकसित करने में मदद कर सकती है। इसके अलावा, कृषि से निकलने वाले उप-उत्पाद का इस्तेमाल कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने का रास्ता दिखाता है। इससे पानी साफ करने का अधिक टिकाऊ तरीका अपनाने को बढ़ावा मिलता है।”

प्रयोगशाला स्तर पर विकसित सामग्री और पानी साफ करने की इस तकनीक की उपयोगिता की पुष्टि के बाद यह शोध प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर चार (टीआरएल 4) तक पहुंच गया है। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों के आधार पर शोधकर्ताओं ने बिजली और इस्तेमाल किए गए रसायनों की लागत को ध्यान में रखते हुए सामग्री तैयार करने का खर्च लगभग 37 रुपये प्रति ग्राम आंका है।

अगले चरण में शोध टीम एक वास्तविक नमूना तैयार करने और विकसित सामग्री के व्यावहारिक इस्तेमाल, लंबे समय तक उसके प्रदर्शन तथा संचालन की लागत का आकलन करने की योजना बना रही है।

भाषा जोहेब पवनेश

पवनेश