नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर (भाषा) कृषि मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के एक संस्थान द्वारा विकसित सोयाबीन की दो किस्मों से इस साल प्रतिकूल मौसम के बावजूद प्रति हेक्टेयर करीब 20 क्विंटल उपज मिली है, जो राष्ट्रीय औसत 10-11 क्विंटल की तुलना में लगभग दोगुना है।
मंत्रालय के अनुसार, ये शुरुआती आंकड़े नौ अक्टूबर को राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (एनएसआरआई) द्वारा आयोजित ‘सोयाबीन हार्वेस्ट डे’ (सोयाबीन कटाई दिवस) के दौरान सामने आए। इस अवसर पर दोनों किस्मों की एक-एक एकड़ क्षेत्र में उगाई गई फसल की कटाई की गई। इस पहल का उद्देश्य उन्नत किस्मों की उपज क्षमता का आकलन करना और व्यवस्थित रूप से उपज के आंकड़े जुटाकर उत्पादकता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार करना था।
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक एम एल जाट ने इन नतीजों का स्वागत करते हुए कहा कि सोयाबीन की उत्पादकता बढ़ाने में उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक उत्पादन तकनीकों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
मंत्रालय के बयान के अनुसार, जाट ने इस साल प्रतिकूल मौसम को देखते हुए इन शुरुआती आंकड़ों को ‘बेहद उत्साहजनक’ बताया। उन्होंने कहा कि आंकड़ों के वैज्ञानिक विश्लेषण से भविष्य की अनुसंधान रणनीतियों को दिशा देने में मदद मिलेगी।
एनएसआरआई और सोयाबीन पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के शोध एवं परीक्षणों से पता चला है कि उन्नत किस्मों और उपयुक्त उत्पादन तकनीकों के इस्तेमाल से प्रति हेक्टेयर 15-20 क्विंटल उपज हासिल की जा सकती है। अनुकूल परिस्थितियों में यह उपज 22-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है।
निदेशक ने कहा कि ‘हार्वेस्ट डे’ के आंकड़ों का महत्व केवल एक साल की उपज तक सीमित नहीं है। कई वर्षों तक व्यवस्थित रूप से आंकड़े जुटाने और उनका विश्लेषण करने से विभिन्न क्षेत्रों, किस्मों और उत्पादन परिस्थितियों में उत्पादकता में होने वाले बदलावों को समझने में मदद मिलेगी। इससे हर साल होने वाले सुधारों का आकलन करने और भविष्य में उपज बढ़ाने की संभावनाओं का अनुमान लगाने के लिए वैज्ञानिक आधार मिलेगा।
उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक आंकड़ों से अनुसंधान और कृषि तकनीकों के प्रसार से जुड़े प्रयासों की दक्षता का आकलन करने में भी मदद मिलेगी।
संस्थान सोयाबीन की किस्मों की वास्तविक उपज क्षमता का आकलन करने, उन्नत तकनीकों के प्रभाव को समझने और अधिक उपज देने वाली किस्मों तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों की जानकारी किसानों तक पहुंचाने के लिए नियमित रूप से ऐसे कार्यक्रम आयोजित करता है।
अधिकारियों ने कहा कि इस पहल से सोयाबीन अनुसंधान, कृषि विस्तार सेवाओं और किसानों तक वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने के बीच समन्वय मजबूत होगा।
फसल कटाई से मिले आंकड़ों का आगे विश्लेषण किया जाएगा, ताकि विभिन्न किस्मों के प्रदर्शन और उत्पादन की अलग-अलग परिस्थितियों के प्रभाव को समझा जा सके।
भाषा राजेश राजेश अजय
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