नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर (भाषा) इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि ने मंगलवार को कृत्रिम मेधा (एआई) से भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवा क्षेत्र में नौकरियां खत्म होने की आशंकाओं को खारिज करते हुए इसे ‘बेतुका’ और ‘बड़ी पूंजी के हितों के अनुरूप आपदा का डर दिखाने वाली बातें’ करार दिया।
उन्होंने कहा कि इन्फोसिस जैसी कंपनियों की सेवाओं की मांग पहले से कहीं अधिक है।
ब्लूमबर्ग न्यू इकॉनमी फोरम 2026 में नीलेकणि ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालीना जॉर्जीवा के एआई को ‘धीरे-धीरे बढ़ने वाली सुनामी’ बताने वाले बयान पर प्रतिक्रिया दी।
जॉर्जीवा ने कहा था कि एआई नियमित कार्यों को अपने हाथ में लेकर बड़ी संख्या में कर्मचारियों की मांग खत्म कर सकता है।
नीलेकणि ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि यह सब बड़ी पूंजी के हितों के अनुरूप आपदा का डर दिखाने वाली बातें हैं। वास्तविकता यह है कि इन्फोसिस जैसी कंपनियों की जरूरत पहले से कहीं अधिक है, क्योंकि किसी कंपनी के कामकाज में बदलाव एक बेहद जटिल प्रक्रिया है। एआई के लिए कारोबार करने के तरीके पर नए सिरे से विचार करना जरूरी है। इसके लिए जड़ से लेकर हर स्तर तक बदलाव करने होंगे।’’
उन्होंने कहा कि एआई के दौर में इन्फोसिस जैसी कंपनियों को अन्य कंपनियों को उनके कामकाज में इस तरह के बदलाव करने में मदद करनी होगी।
नीलेकणि ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि हमारे पास पहले से ज्यादा काम आएगा।’’
उन्होंने कहा कि कंपनियों को अपने कामकाज में बदलाव करने, कर्मचारियों को नए कौशल सिखाने और नई क्षमताएं विकसित करने की जरूरत होगी।
उन्होंने कहा, ‘‘एआई प्रौद्योगिकी की क्षमता उसके वास्तविक इस्तेमाल से कहीं आगे है।’’
नीलेकणि ने कहा कि क्लाउड कंप्यूटिंग का आविष्कार करीब 20 साल पहले हुआ था, लेकिन आज भी इसका इस्तेमाल हर जगह नहीं हो रहा है। कंपनियों को नई प्रौद्योगिकी अपनाने में वर्षों लगते हैं, क्योंकि उन्हें पुरानी प्रणालियों, बदलाव के प्रबंधन और संगठन के भीतर शक्ति संतुलन जैसी चुनौतियों से निपटना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि एआई आधारित कोडिंग एजेंट पारंपरिक कोडिंग के काम को स्वचालित कर रहे हैं, जिससे उत्पादकता में काफी वृद्धि होगी। हालांकि, कारोबार में बदलाव का मतलब केवल कोडिंग तक सीमित नहीं है।
नीलेकणि ने कहा, ‘‘किसी भी प्रौद्योगिकी परियोजना में प्रौद्योगिकी की हिस्सेदारी केवल 30 प्रतिशत होती है, जबकि 70 प्रतिशत हिस्सा संचालन व्यवस्था, बदलाव के प्रबंधन, कामकाज में परिवर्तन और सुरक्षा उपायों से जुड़ा होता है। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि आपके एआई बॉट गलत जानकारी न दें और आपके एजेंट नियंत्रण से बाहर न जाएं। इन बातों पर ध्यान देने की जरूरत है।’’
उन्होंने कहा कि ग्राहकों की जरूरतों को समझने, आपसी सहयोग और लोगों को मिलकर काम करने में सक्षम बनाने जैसे क्षेत्रों में नए रोजगार पैदा होंगे।
इस साल भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनियों के शेयरों पर मूल्यांकन के दबाव के बारे में पूछे जाने पर नीलेकणि ने कहा, ‘‘बाजार का इस बारे में अपना नजरिया होगा।’’
उन्होंने कहा कि नई प्रौद्योगिकी की स्वीकार्यता में समय लगता है।
उन्होंने विशिष्ट पहचान संख्या ‘आधार’ का उदाहरण देते हुए कहा कि एक अरब लोगों तक पहुंचने में सात से आठ साल लगे। आधार को बनाने में नीलेकणि की अहम भूमिका रही थी।
नीलेकणि ने कहा कि भारत में रोजगार सृजन में छोटे कारोबार की अहम भूमिका होगी।
उन्होंने कहा कि तीन से पांच कर्मचारियों वाली कंपनियां कई तरह के जटिल काम करती हैं, जिन्हें स्वचालित करना संभव नहीं है।
उन्होंने ऐसे कार्यों को ‘‘एआई से अप्रभावित रहने वाली नौकरियां’’ बताया।
भाषा योगेश अजय
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