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अगर आप दुनिया से कटकर अलग-थलग रहते हैं, तो अकेलापन डरावना होता है: अनुपम खेर

(सागर कुलकर्णी)

वाशिंगटन, 11 अक्टूबर (भाषा) अभिनेता अनुपम खेर ने कहा है कि वह स्टार होने का बोझ अपने कंधों पर लेकर नहीं चलते, क्योंकि ऐसा करने से वह अकेले पड़ जाएंगे।

खेर (71) ने कुछ वर्षों के अंतराल के बाद नाटक ‘जाने पहचाने अनजाने’ के साथ रंगमंच पर वापसी की है। यह नाटक हास्य और संगीत के जरिए अकेलेपन तथा रिश्तों जैसे विषयों को सामने लाता है।

अमेरिका और कनाडा की 45 दिन की यात्रा के दौरान, 540 से अधिक फिल्म में काम कर चुके खेर और उनकी नाटक मंडली ने विभिन्न शहरों में प्रस्तुतियां दीं और दर्शकों की सराहना बटोरी।

निर्देशक गजेंद्र अहिरे के साथ पटकथा पढ़ने के सत्र से कुछ समय निकालकर खेर ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मैं अनुपम खेर होने का बोझ अपने कंधों पर लेकर नहीं चलता।’’

यात्रा के अपने अनुभव साझा करते हुए खेर ने कहा, ‘‘अगर अनुपम खेर एक स्टार के तौर पर इस लॉबी में नहीं बैठेंगे, जहां ब्रेड-बटर की दुकान है या बसों में सफर नहीं करेंगे, तो वह बहुत अकेले नजर आने लगेंगे।’’

खेर ने कहा, ‘‘अगर आप दुनिया से कटकर एक अलग दुनिया में रहते हैं, तो अकेलापन डरावना होता है। मैं ऐसा नहीं करता। मैं बहुत सामान्य जीवन जीता हूं।’’

यह नाटक खेर का संगीत प्रधान नाटक प्रस्तुत करने का पहला प्रयोग है, जिसे अमेरिका में दर्शकों ने खूब पसंद किया।

अभिनेता ने कहा, ‘‘भारत के बाहर रहने वाले लोग भावनात्मक रूप से भारत से जुड़े हुए हैं। जब वे कोई कहानी देखते हैं, खासकर जब उसे मंच पर कोई लोकप्रिय अभिनेता प्रस्तुत करता है, तो वे उस व्यक्ति और विषय से खुद को अधिक जुड़ा हुआ महसूस करते हैं।’’

उन्होंने कहा कि वह ऐसे नाटक में अभिनय करते रहे हैं, जिनसे दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ सकें।

खेर चार दशक से अधिक लंबे अभिनय करियर के दौरान रंगमंच से भी जुड़े रहे हैं। उन्होंने अपनी पत्नी किरण के साथ ‘सालगिरह’, जबकि नीना गुप्ता के साथ ‘कुछ भी हो सकता है’ और ‘मेरा वो मतलब नहीं था’ जैसे नाटकों में अभिनय किया है।

खेर ने कहा, ‘‘मैंने शेक्सपियर, बर्टोल्ट ब्रेख्त और शैलीबद्ध नाटक किए हैं। लेकिन फिल्मों से अलग रंगमंच पर काम करते समय मुझे ऐसे नाटक करना पसंद है, जिनसे दर्शक आसानी से जुड़ सकें।’’

उन्होंने कहा, ‘‘दर्शकों के बीच बैठा कोई पिता नाटक देखकर कह सकता है, ‘अरे, यह तो मेरी कहानी है।’ इसलिए सौभाग्य से इस नाटक को भी वैसी ही प्रतिक्रिया मिली है।’’

‘जाने पहचाने अनजाने’ आधुनिक मध्यमवर्गीय समाज में मानवीय रिश्तों और अकेलेपन की कहानी है। इसमें एक विधवा, एक विधुर, किराये पर रहने आया एक युवा और अधेड़ावस्था में पति से अलग हुई एक महिला की जिंदगी को दर्शाया गया है।

यह नाटक तीन पीढ़ियों के अनुभवों को सामने लाता है। इनमें अपने बच्चों से दूर रहने वाले बुजुर्ग, अधेड़ उम्र के लोग और युवा शामिल हैं।

खेर ने कहा, ‘‘मोबाइल फोन, इंटरनेट और अन्य प्रौद्योगिकी में आई क्रांति ने अकेलेपन की महामारी को जन्म दिया है। कई देशों ने इसे महामारी घोषित किया है और भारत में भी ऐसा हो रहा है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हम ऐसे दौर में पहुंच गए हैं, जहां मुस्कुराहट और गले मिलने की जगह ‘इमोजी’ ने ले ली है। हमने कुछ खो दिया है। मैं यह बात व्यंग्य में नहीं कह रहा हूं, क्योंकि हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जो बदल रही है। हमने इस दुनिया में जीवन बिताया है, लेकिन इस बदलाव ने मानवीय स्पर्श को कुछ हद तक हमसे छीन लिया है।’’

भाषा सुभाष रंजन

रंजन