(गुंजन शर्मा)
नयी दिल्ली, 11 अक्टूबर (भाषा) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) छात्रों और शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का एक अलग कैडर बनाने पर विचार कर रहे हैं। आईआईटी के निदेशकों ने यह जानकारी दी।
इस साल कई आईआईटी परिसर में अलग-अलग कारणों से छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं के बाद विवाद हुआ है। हालांकि, दो आईआईटी के निदेशकों ने पुष्टि की कि विशेषज्ञों का अलग कैडर बनाने की योजना हाल में हुई आत्महत्या की घटनाओं के कारण नहीं है, बल्कि इस पर कम से कम दो साल से विचार-विमर्श जारी है।
आईआईटी ने पहले भी छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए कई पहल की हैं। हालांकि, 18 सितंबर को आईआईटी-मुंबई के एक छात्र के परिसर स्थित छात्रावास के कमरे में पंखे से लटका हुआ मिलने के बाद विरोध प्रदर्शन हुए और छात्रों की आत्महत्या का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया।
इस घटना से पहले अगस्त में आईआईटी-दिल्ली के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली थी, जिसके बाद परिसर में आक्रोश उत्पन्न हो गया था। देश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में हाल के वर्षों में इस तरह की कई घटनाएं हो चुकी हैं।
शिक्षा मंत्रालय ने इस साल की शुरुआत में संसद को बताया था कि सभी आईआईटी, भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) और भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईआईटी) ने अपने परिसरों में मानसिक स्वास्थ्य या परामर्श के लिए विशेष केंद्र स्थापित किए हैं।
इन केंद्रों में अंशकालिक रूप से आने वाले पेशेवर परामर्शदाता, क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक और कुछ मामलों में मनोचिकित्सक तैनात हैं।
आईआईटी के एक निदेशक ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘फिलहाल सभी परिसरों में छात्रों के लिए परामर्श की सुविधा उपलब्ध है। कुछ आईआईटी ने बाहरी ऐप की सेवाएं ली हैं, जबकि कई में परिसर के भीतर परामर्शदाता हैं। लेकिन परिसरों में छात्रों की संख्या को देखते हुए यह पर्याप्त नहीं है और स्थायी तथा दीर्घकालिक समाधान तलाशा जा रहा है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘पिछले कुछ वर्षों में आईआईटी में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी पहल पर ध्यान दिया जाता रहा है। कम से कम दो साल से इस पर विचार-विमर्श जारी है कि आईआईटी में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का एक उचित कैडर होना चाहिए, जो न केवल छात्रों, बल्कि शिक्षकों और परिसर में काम करने वाले अन्य कर्मचारियों को भी सहायता उपलब्ध कराए।’’
देश में इस समय 23 आईआईटी संचालित हैं। प्रत्येक परिसर में छात्रों की संख्या तीन हजार से 18 हजार के बीच है। इसके अलावा, वहां शिक्षक, उनके परिवार और परिसर में रहने वाला व्यापक समुदाय भी है।
एक अन्य आईआईटी निदेशक ने कहा, ‘‘आईआईटी में परामर्शदाताओं, मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के लिए समर्पित पद सृजित किए जाने की जरूरत महसूस की गई है क्योंकि जब तक विशिष्ट पद सृजित नहीं किए जाते और उनके लिए धनराशि निर्धारित नहीं होती, तब तक संविदा पर भी नियुक्तियां करना संभव नहीं है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यह विचार हाल में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का नतीजा नहीं है। यह प्रस्ताव पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के समक्ष भी रखा गया था। आईआईटी गांधीनगर सभी आईआईटी के लिए एक ढांचा तैयार करने पर काम कर रहा है, जिसमें परामर्शदाताओं, मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के स्वीकृत पद शामिल होंगे।’’
पिछले साल हुई आईआईटी परिषद की बैठक के कार्यवृत्त के अनुसार, तैयार किए जाने वाले इस ढांचे में भारतीय पुनर्वास परिषद (आरसीआई) के दिशानिर्देशों का पालन किया जाएगा। इसमें पदोन्नति के पर्याप्त अवसर और समय-समय पर गुणवत्ता का आकलन करने के प्रावधान भी होंगे, ताकि एक टिकाऊ और भरोसेमंद व्यवस्था बनाई जा सके।
बिट्स पिलानी समूह के कुलपति और आईआईटी-दिल्ली के पूर्व निदेशक वी. रामगोपाल राव ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है।
उन्होंने कहा है कि आईआईटी में इस तरह की समस्याओं की एक वजह सभी के लिए एक समान व्यवस्था अपनाने का तरीका है। उन्होंने कहा था कि आईआईटी में विभिन्न पृष्ठभूमियों से आने वाले मेधावी छात्रों को प्रवेश तो दिया जाता है, लेकिन पढ़ाने और सीखने के तरीकों में उनकी विविधता को ध्यान में नहीं रखा जाता।
उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित राष्ट्रीय कार्यबल (एनटीएफ) ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में कहा था कि आईआईटी के शिक्षक मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए खुद को पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं मानते।
रिपोर्ट के अनुसार, 90 प्रतिशत शिक्षकों के पास ऐसी संवेदनशील समस्याओं से जूझ रहे छात्रों की मदद करने के लिए उचित प्रशिक्षण नहीं था।
कार्यबल ने 23 आईआईटी सहित केंद्र सरकार से वित्तपोषित 31 संस्थानों के जवाबों का हवाला दिया। इनके अनुसार, 18 संस्थानों में कम से कम एक मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता था, लेकिन केवल चार संस्थानों ने बताया कि उनके यहां शिक्षकों को मार्गदर्शन कार्यक्रमों के लिए औपचारिक प्रशिक्षण दिया जाता है।
समिति ने यह भी कहा कि विभिन्न संस्थानों में ‘परामर्शदाता’ शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग अर्थों में किया जाता है। इससे यह आकलन करना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में कितने प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ उपलब्ध हैं। समिति को 31 अक्टूबर तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपनी है।
आईआईटी-रुड़की ने इस साल की शुरुआत में घोषणा की थी कि उसने एक व्यापक मानसिक स्वास्थ्य नीति तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसे सभी आईआईटी के लिए एक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
आईआईटी-खड़गपुर ने एक पहल लागू की है, जिसके तहत शाम के समय बिजली बंद कर दी जाती है, ताकि छात्र इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दूर होकर एक-दूसरे से बातचीत करें और अकेलेपन से बचें। इसी तरह, आईआईटी-गुवाहाटी का ‘अपने पड़ोसी को जानें’ अभियान छात्रों के बीच आपसी संबंध मजबूत करने के उद्देश्य से शुरू किया गया है।
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करने और आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए विभिन्न आईआईटी ने पाठ्यक्रम में बदलाव, परिसर में स्वास्थ्य एवं परामर्श केंद्र, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी वेबसाइट और ऐप, संकट के शुरुआती संकेत पहचानने वाले लोगों को प्रशिक्षण देने की व्यवस्था तथा सहपाठी सहयोग समूह जैसे अन्य उपाय भी किए हैं।
भाषा अमित रंजन
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