नयी दिल्ली, 11 अक्टूबर (भाषा) दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के विरोध प्रदर्शन के बीच उच्चतम न्यायालय ने रविवार को निर्देश दिया कि शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने वाले लोगों को अवैध रूप से हिरासत में न लिया जाए और उसने यह सुनिश्चित करने को भी कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत को देखते हुए दिल्ली मेट्रो सामान्य रूप से संचालित हो और इंटरनेट सेवाओं में कोई बाधा न आए।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने विशेष सुनवाई के दौरान उस याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया, जिसमें कॉजपा के विरोध प्रदर्शन के कारण दिल्ली में मेट्रो और ट्रेन सेवाओं पर ‘‘पूरी तरह रोक’’ नहीं लगाने संबंधी अदालत के निर्देश के कथित उल्लंघन को लेकर अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया गया है।
निर्वाचन आयोग के कामकाज में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कॉजपा और कुछ छात्र संगठनों ने प्रदर्शन का आह्वान किया था।
सरकार ने शनिवार को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था करके और 7,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर जंतर-मंतर पर प्रस्तावित बड़े प्रदर्शन को रोक दिया। हिरासत में लिए गए लोगों में कॉजपा नेता अभिजीत दीपके, विपक्ष के कई नेता और यूट्यूबर ध्रुव राठी भी शामिल थे।
पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह सुनिश्चित करने को कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत को ध्यान में रखते हुए दिल्ली मेट्रो अपनी सामान्य समय-सारिणी के अनुसार चले और इंटरनेट सेवाएं बाधित न हों।
उच्चतम न्यायालय ने मेहता से यह सुनिश्चित करने को भी कहा कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य लोगों को अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन करने से न रोका जाए।
पीठ ने कहा, ‘‘कानून के अनुसार इंटरनेट सेवाएं निर्बाध रूप से जारी रहेंगी...जब हम कह रहे हैं कि इंटरनेट सेवाएं निर्बाध रूप से जारी रहनी चाहिए, तो हमारा आशय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत प्राप्त शक्तियों को समाप्त करना नहीं है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी को भी अवैध रूप से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। यह विशेष रूप से उन लोगों के एकत्र होने के मामले में लागू होगा, जो उस क्षेत्र के बाहर हैं, जहां निषेधाज्ञा लागू की गई है।’’
उच्चतम न्यायालय ने अपने परिसर के बाहर लगाए गए उस सूचना बोर्ड को हटाने का आदेश दिया, जिस पर लिखा था कि पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक लगाने वाली भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू है।
पीठ ने कहा, ‘‘हमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय के परिसर और उसके आसपास के क्षेत्र में बीएनएसएस की धारा 163 लागू होने की जानकारी देने वाला एक सूचना बोर्ड लगाया गया है।’’
पीठ ने आदेश दिया, ‘‘हम संबंधित प्राधिकरण को निर्देश देते हैं कि यदि यह बोर्ड नहीं हटाया गया है, तो इसे हटा दिया जाए, ताकि नागरिकों और वकीलों को न्याय तक पहुंच मिल सके।’’
सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद मनोज झा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि पुलिस ट्रेनों से लोगों को हिरासत में ले रही थी। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर के चार किलोमीटर के दायरे से बाहर मौजूद लोगों को भी हिरासत में लिया जा रहा था, जबकि जंतर-मंतर पर निषेधाज्ञा लागू है।
उन्होंने उच्चतम न्यायालय को बताया कि नौ अक्टूबर के उसके आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशनों पर यात्रियों के प्रवेश और निकास पर रोक लगा दी गई थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि शहर में लगभग 45 हिरासत केंद्र बनाए गए हैं और विपक्षी नेताओं सहित करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया है।
उन्होंने दलील दी कि जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन, विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन और अन्य स्टेशनों को आम लोगों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि अदालत के आदेश का जानबूझकर और सोची-समझी मंशा से उल्लंघन किया गया है।
शनिवार को विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा कि बड़ी संख्या में वकीलों के साथ ही उनके साथ भी ‘‘बर्बर व्यवहार’’ किया गया। उन्होंने कहा कि शहर में स्थिति बेहद दमनकारी थी।
फरासत ने कहा, ‘‘यह नागरिकों के विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार का मामला है। कल मुझे जो स्थिति महसूस हुई, उससे लगा कि हम पुलिस राज्य बनने से बस एक कदम दूर हैं। कृपया राजधानी में नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार को बहाल करें। कल इस अधिकार को खत्म कर दिया गया था।’’
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी, उत्तरा बब्बर और शादान फरासत को हिरासत में लिया गया था। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से मार्च कर रहे लोगों के साथ हिंसा की गई।
शंकरनारायणन ने कहा कि लोगों की निर्बाध आवाजाही पूरी तरह बहाल की जानी चाहिए, सभी अवरोधक हटा दिए जाने चाहिए और मेट्रो स्टेशनों पर सेवाएं बहाल करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।
मेहता ने दलील दी कि 10 अक्टूबर को मेट्रो नेटवर्क के कुल 303 स्टेशनों में से केवल 45 पर ही प्रवेश और निकास प्रतिबंधित किया गया था। उन्होंने कहा कि यह पूरे मेट्रो नेटवर्क का महज 15 प्रतिशत है।
उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई के अनुरोध वाली याचिकाएं अब विचारणीय नहीं रह गई हैं, क्योंकि हिरासत में लिए गए अधिकांश लोगों को पहले ही रिहा किया जा चुका है।
सुनवाई शुरू होते ही उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वह इस मामले में अदालत के निर्देशों के कथित खुले उल्लंघन को लेकर अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के अनुरोध वाली याचिका पर सभी वकीलों को अपनी दलीलें रखने का अवसर देगा।
उच्चतम न्यायालय ने नेताओं की हिरासत को चुनौती देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर भी सुनवाई की।
उच्चतम न्यायालय में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद मनोज झा की ओर से दायर एक याचिका भी विचाराधीन है। इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने का आरोप लगाया गया है।
राजद सांसद ने आरोप लगाया कि पुलिस ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों, छात्र नेताओं, वकीलों, नेताओं और आम नागरिकों को अवैध रूप से हिरासत में लिया, उनका अपहरण किया और उन्हें घरों में नजरबंद रखा। उन्होंने ‘‘महिला प्रदर्शनकारियों का यौन उत्पीड़न’’ किए जाने का आरोप भी लगाया।
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर अवमानना याचिका में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) की अध्यक्ष डी. थारा को प्रतिवादी बनाया गया है।
याचिका में उच्चतम न्यायालय के नौ अक्टूबर के आदेश का उल्लेख किया गया है। यह आदेश दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर 57 मेट्रो स्टेशन को बंद करने और दिल्ली आने वाली ट्रेनों को रद्द किए जाने के खिलाफ दायर एक अन्य याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया था।
बाद में, राज्यसभा सदस्य एवं वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों को लेकर उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का रविवार को स्वागत करते हुए कहा, ‘‘हम भारत के उच्चतम न्यायालय के प्रति हृदय से आभारी हैं कि उसने ऐसा आदेश पारित किया है, जिससे भारतीय लोगों के साथ-साथ पेशेवरों का भी इस देश की न्याय व्यवस्था में विश्वास बहाल हुआ है।”
शुक्रवार को याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बागची तथा न्यायमूर्ति मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि विरोध प्रदर्शन के कारण 10 अक्टूबर को दिल्ली आने वाली मेट्रो और ट्रेनों की आवाजाही पर ‘‘पूरी तरह रोक’’ नहीं लगाई जाए। पीठ ने कहा था कि सब कुछ ठप नहीं किया जा सकता।
उच्चतम न्यायालय ने कहा था भले ही कानून लागू करने वाली एजेंसियों को अनियंत्रित गतिविधियों को रोकने के लिए कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन नागरिकों को बेवजह परेशान नहीं किया जाना चाहिए।
दिल्ली मेट्रो ने एक परामर्श के अनुसार, सुरक्षा कारणों से शुक्रवार रात नौ बजे से शनिवार शाम छह बजे तक 45 स्टेशनों को बंद रखा था।
न्यायालय ने नौ अक्टूबर के अपने आदेश में कहा था, ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि ये अधिसूचनाएं अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़ रही हैं, क्योंकि इनमें आवश्यक सार्वजनिक परिवहन पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। हमारे यह स्पष्ट करने पर कि मेट्रो और अन्य ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह ‘रोक’ लगाने और उसे ‘नियमित’ करने में अंतर है, भारत के सॉलिसिटर जनरल ने अधिकारियों को इन पाबंदियों की फिर से समीक्षा करने के लिए राजी करने पर सहमति जताई है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘इस आश्वासन के मद्देनजर हम स्पष्ट करते हैं कि हालांकि मेट्रो ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जाएगी, लेकिन विवेकपूर्ण निर्णय लेकर मेट्रो ट्रेनों और अन्य रेल सेवाओं का संचालन उपयुक्त और नियंत्रित तरीके से करने की अनुमति दी जा सकती है।’’
न्यायालय ने कहा कि लोगों को आगे होने वाली असुविधा से बचाने के लिए इस निर्णय का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि शहर के भीतर वाहनों की आवाजाही सुचारु बनाए रखने के लिए यातायात संबंधी परामर्श भी समाचार पत्रों और ऑनलाइन मंचों पर प्रकाशित किया जाना चाहिए, ताकि शहर में यात्रा के दौरान आम लोगों को किसी तरह की परेशानी या असुविधा न हो।
भाषा गोला दिलीप
दिलीप