नयी दिल्ली, 10 अक्टूबर (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को कहा कि आम आदमी पार्टी (आप) से निष्कासित नेता ताहिर हुसैन ने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान भीड़ को अपने भवन का इस्तेमाल पत्थरबाजी के लिए करने दिया था। अदालत ने हुसैन को दंगा करने के लिए उकसाने का दोषी ठहराया।
दंगों से जुड़े एक मामले में हुसैन को दूसरी बार दोषी ठहराया गया है। इससे पहले 31 जुलाई को दिल्ली की एक अदालत ने खुफिया ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में आप के पूर्व पार्षद हुसैन और चार अन्य दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने दयालपुर थाने में दर्ज मामले में हुसैन को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147 (दंगा करने) के साथ धारा 109 (दुष्प्रेरण) के तहत दोषी ठहराया।
हालांकि, अदालत ने उन्हें अधिक गंभीर आरोपों से बरी कर दिया। इनमें आईपीसी की धारा 148 (घातक हथियार से लैस होकर दंगा करना), धारा 380 (आवासीय भवन में चोरी), धारा 427 (नुकसान पहुंचाने वाली शरारत), धारा 435 और 436 (आग या विस्फोटक पदार्थ से नुकसान पहुंचाना) तथा धारा 450 (ऐसा अपराध करने के इरादे से अनधिकृत प्रवेश, जिसके लिए उम्रकैद की सजा हो सकती है) शामिल हैं। ये आरोप धारा 109 के साथ लगाए गए थे।
अदालत ने 53 पन्नों के फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे साबित किया कि 24 फरवरी 2020 को दोपहर दो से तीन बजे के बीच एक भीड़ मुख्य करावल नगर रोड स्थित हुसैन के घर की छत पर जमा हुई थी।
भीड़ ने इमारत की ऊंचाई का फायदा उठाकर राहगीरों और आसपास की संपत्तियों पर पत्थर फेंके थे।
अदालत ने कहा, ‘‘यह साबित होता है कि आरोपी ताहिर हुसैन ने भीड़ को अपने भवन का इस्तेमाल ऐसे स्थान के रूप में करने दिया, जहां से उसने दंगा किया और आम लोगों तथा संपत्तियों पर पत्थर फेंके।’’
अदालत ने चार स्वतंत्र गवाहों की गवाही पर भरोसा किया। उन्होंने बताया था कि हुसैन के घर के बाहर बड़ी संख्या में लोग जमा थे और छत पर मौजूद भीड़ पत्थरबाजी कर रही थी। इनमें से किसी भी गवाह ने हुसैन को दंगाइयों में शामिल नहीं बताया था।
अदालत ने कहा कि इससे संकेत मिलता है कि गवाहों के मन में उनके प्रति कोई दुर्भावना या पक्षपात नहीं था।
अदालत ने यह भी गौर किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत बयान दर्ज करते समय आरोपों के बारे में पूछे जाने पर हुसैन ने इस बात से इनकार नहीं किया कि उनकी छत पर दंगा करने वाली भीड़ मौजूद थी।
हुसैन ने दावा किया कि भीड़ जबरन उनके घर में घुस गई थी और वह उसे रोक नहीं सके। उसने यह भी कहा कि उन्होंने पुलिस नियंत्रण कक्ष (पीसीआर) को कई बार फोन किया था और उन्हें अपनी छत से की जा रही पत्थरबाजी की जानकारी नहीं थी।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यह स्वीकारोक्ति न केवल हुसैन के घर की छत पर दंगा करने वाली भीड़ की मौजूदगी के संबंध में इन गवाहों की गवाही की पुष्टि करती है, बल्कि उस समय की परिस्थितियों में इससे उनकी इस गवाही को भी बल मिलता है कि दंगाई राहगीरों और आसपास की संपत्तियों पर पत्थर फेंक रहे थे।’’
न्यायाधीश ने कहा कि हुसैन के बचाव में दिए गए दावे को केवल उनके कहने भर से स्वीकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, उन्होंने बचाव में साक्ष्य पेश करने का विकल्प चुना था। लेकिन अंततः कोई साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया।
उन्होंने पुलिस नियंत्रण कक्ष को फोन करने के अपने दावे को साबित करने के लिए गवाह के तौर पर खुद भी बयान नहीं दिया।
अदालत ने कहा कि उनका यह दावा वास्तव में ‘‘उस समय उनके घर में या उसके आसपास मौजूद होने को दर्शाता है।’’
अदालत ने कहा, ‘‘अभियोजन पक्ष यह साबित करने में सफल रहा है कि आरोपी ताहिर हुसैन ने भीड़ को अपनी छत पर जमा होने और वहां से राहगीरों तथा अपने घर के आसपास की इमारतों पर पत्थर फेंकने की अनुमति दी थी।’’
विशेष लोक अभियोजक मधुकर पांडे ने दलील दी थी कि प्रत्यक्षदर्शियों ने सभी आरोपियों को दंगा करने वाली भीड़ में मौजूद बताया था और हुसैन ने अपने घर से पत्थरबाजी करने की अनुमति देकर दंगाइयों की मदद की थी।
हालांकि, अदालत ने अभियोजन पक्ष के इस दावे को खारिज कर दिया कि हुसैन ने भीड़ को हथियार मुहैया कराए थे या उसे उकसाया था अथवा दंगाइयों ने इरशाद अली, मोहम्मद जाहिद और गुंजन सचदेवा की दुकानों में आग लगाई थी।
अदालत ने कहा कि किसी भी गवाह ने हुसैन को भीड़ में मौजूद नहीं बताया और न ही यह गवाही दी कि उन्होंने दुकानों में तोड़फोड़, लूटपाट या आगजनी के लिए उकसाया था।
अदालत ने पाया कि गवाहों के बयानों में सीआरपीसी की धारा 161 के तहत पहले दर्ज किए गए उनके बयानों की तुलना में कई महत्वपूर्ण बदलाव थे। अदालत ने गवाहों की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि जांच अधिकारी ने संबंधित तथ्यों को दर्ज नहीं किया था।
न्यायाधीश ने कहा कि इन गवाहों की गवाही पर भरोसा करना ‘‘बेहद जोखिम भरा’’ होगा। अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष दोनों थानों की ड्यूटी सूची पेश कर यह साबित नहीं कर सका कि संबंधित गवाह घटना के समय मौके पर मौजूद थे।
न्यायाधीश ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह मौखिक साक्ष्यों पर आधारित था। अदालत के अनुसार, घटना के वीडियो फुटेज एकत्र कर उन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया था, लेकिन सुनवाई के दौरान उन्हें साक्ष्य के रूप में साबित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
अदालत ने कहा कि हुसैन को आईपीसी की धारा 147 के साथ धारा 109 के तहत दोषी ठहराया जा सकता है, भले ही उन पर इन धाराओं के तहत आरोप नहीं लगाए गए थे।
अदालत के अनुसार, यह अपराध उन आरोपों से कम गंभीर और उनसे संबंधित था, जिनका सामना हुसैन कर रहे थे। साथ ही, इससे उनके बचाव का पक्ष प्रभावित नहीं हुआ।
अदालत ने अन्य सभी आरोपियों मोहम्मद शादाब, शाह आलम, रियासत अली, गुलफाम, राशिद सैफी, मोहम्मद रिहान, मोहम्मद आबिद, अरशद कय्यूम और इरशाद अहमद को बरी कर दिया।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रहा। उनके जमानत बांड रद्द कर दिए गए और जमानतदारों को मुक्त कर दिया गया।
मामले में हुसैन को दी जाने वाली सजा की अवधि पर दलीलें सुनने के लिए 16 नवंबर की तारीख तय की गई है।
दंगों के सिलसिले में हुसैन के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के कुछ घंटे बाद फरवरी 2020 में आप ने उन्हें निष्कासित कर दिया था।
वह 2024 में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) में शामिल हो गए थे और 2025 का दिल्ली विधानसभा चुनाव पार्टी के टिकट पर लड़े थे लेकिन हार गए।
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और संपत्ति को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा था।
भाषा रंजन नरेश
नरेश