(अभिषेक शुक्ला)
नयी दिल्ली, नौ अक्टूबर (भाषा) केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली तत्कालीन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के दौरान 2002 में हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के विनिवेश मामले में ‘क्लोजर रिपोर्ट’ दाखिल करते हुए कहा है कि जांच के दौरान प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
एजेंसी ने 2013 में मिनी रत्न कंपनी हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (एचजेडएल) के एक बड़ी निजी खनन कंपनी के पक्ष में किए गए विनिवेश की प्रारंभिक जांच शुरू की थी।
मामले की फाइल के अनुसार, चार साल बाद जांच बंद कर दी गई थी। उस समय सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों, अभियोजकों और जांच अधिकारी के बीच इस बात को लेकर गहरे मतभेद थे कि मामले को बंद करने की सिफारिश की जाए या प्राथमिकी दर्ज की जाए।
वर्ष 2022 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने 2014 में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई को नियमित मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इस याचिका में विनिवेश को चुनौती देते हुए प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप लगाए गए थे।
आदेश के बाद एजेंसी ने 28 अप्रैल, 2022 को प्राथमिकी दर्ज की थी।
सूत्रों ने बताया कि जांच के दौरान आरोपों की ‘‘पुष्टि नहीं हो सकी’’ और ‘‘तथ्यों से किसी संज्ञेय अपराध का होना साबित नहीं होता।’’
सीबीआई की दलीलें सुनने के बाद विशेष अदालत यह फैसला करेगी कि रिपोर्ट स्वीकार की जाए या आगे की जांच का आदेश दिया जाए।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने मामले की फाइल में दर्ज सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों, अभियोजकों और जांच अधिकारी के बीच मतभेदों को रेखांकित किया था।
उन्होंने सीबीआई को निर्देश दिया था कि ‘‘2002 में केंद्र सरकार द्वारा हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड की 26 प्रतिशत हिस्सेदारी के विनिवेश के मामले में नियमित मामला दर्ज करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है।’’
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा था कि इस मामले में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है और नियमित मामला दर्ज किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा था, ‘‘नियमित मामला दर्ज कर उसके बाद विस्तृत जांच की जानी चाहिए।’’
भाषा आशीष पवनेश
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