अहमदाबाद, नौ अक्टूबर (भाषा) गुजरात के भरूच स्थित जामी मस्जिद के परिसर में रखी भगवान मल्लिनाथ की प्रतिमा की तत्काल सुरक्षा और पूजा-अर्चना का अधिकार प्रदान करने का अनुरोध करने वाली जैन समुदाय के लोगों की याचिका पर गुजरात उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) से जवाब मांगा।
भगवान मल्लिनाथ जैन धर्म के कुल 24 तीर्थंकरों में से 19वें तीर्थंकर हैं।
न्यायप्रतिमा निशा ठाकोर की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1958 के तहत राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारकों तथा पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा और संरक्षण करना एएसआई का दायित्व है।
पीठ ने एएसआई का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील को याचिकाकर्ताओं द्वारा दी गई दलीलों के संबंध में आवश्यक निर्देश प्राप्त करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से एएसआई की केंद्रीय संरक्षित स्मारकों की सूची में उल्लिखित 14वीं शताब्दी की 'जामी मस्जिद' को 'अश्वबोध तीर्थ शकुनिका विहार' घोषित करने, जैन धर्मावलंबियों को इस स्मारक के भीतर पूजा करने की अनुमति देने तथा स्मारक में मौजूद जैन धर्म के चिह्नों, प्रतीकों, कलाकृतियों, प्रतिमाओं और अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों को सील कर उनकी सुरक्षा के लिए अंतरिम आदेश जारी करने की मांग की है।
याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय से आशंका जताई है कि प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया जा सकता है।
भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के एक फैसले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं के वकील ने तत्काल अंतरिम आदेश की मांग की। उन्होंने अदालत को बताया कि जैन तीर्थंकर मल्लिनाथ की प्रतिमा स्मारक के परिसर में रखी हुई है, जहां अन्य तस्वीरों और कलाकृतियों को नुकसान पहुंचाया गया है।
दूसरी ओर, एएसआई के वकील ने तर्क दिया कि संरक्षित स्मारक का रखरखाव अब तक प्राधिकार द्वारा 1958 के कानून के प्रावधानों के तहत पूरी तरह से किया गया है।
अदालत इस मामले पर अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को करेगी।
भाषा सुमित संतोष
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