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उत्तर प्रदेश के संविदा शिक्षक 17 हजार रुपये मासिक वेतन पाने के हकदार: उच्चतम न्यायालय

नयी दिल्ली, चार फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में उच्च प्राथमिक विद्यालयों के हजारों संविदा शिक्षकों को बड़ी राहत देते हुए बुधवार को फैसला सुनाया कि वे 2017-18 से 17 हजार रुपये मासिक वेतन पाने के हकदार हैं और उनके अनुबंध की समाप्ति के बाद उन्हें स्थायी रूप से नियुक्त माना जाए।

न्यायालय ने कहा कि इन शिक्षकों का पारिश्रमिक हमेशा के लिए 7,000 रुपये तय करने जैसा अन्यायपूर्ण तरीका जबरन काम कराने और 'बेगार' के समान है, जिसपर संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत कड़ी पाबंदी है।

उत्तर प्रदेश सरकार की एक अपील खारिज करते हुए, न्यायमूर्ति पंकज मिश्रा और न्यायमूर्ति पीबी वराले की पीठ ने राज्य को आदेश दिया कि वह एक अप्रैल 2026 से इन शिक्षकों को प्रति माह 17,000 रुपये के हिसाब से मानदेय देना शुरू करे, और बकाया राशि का भुगतान आज से छह महीने के अंदर किया जाए।

अदालत ने कहा, 'आंशिक समय या संविदा पर नियुक्त किए गए प्रशिक्षकों/शिक्षकों की नियुक्ति प्रारंभिक 11 महीने के अनुबंध या विस्तारित अनुबंध की अवधि समाप्त होने पर संविदा नियुक्ति नहीं रह जाती। इन प्रशिक्षकों/शिक्षकों ने दस साल से अधिक समय तक लगातार काम किया है, इसलिए इन्हें स्थायी रूप से नियुक्त माना जाएगा, क्योंकि समय बीतने के साथ और काम की निरंतरता को ध्यान में रखते हुए, ऐसे पदों का स्वचालित रूप से सृजन हो जाता है।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि इन प्रशिक्षकों/शिक्षकों को मानदेय देने का प्रारंभिक दायित्व राज्य सरकार पर है, जो “भुगतान व वसूली' के सिद्धांत पर भारत संघ से केंद्र सरकार का योगदान वसूलने के लिए स्वतंत्र है।

अदालत ने कहा, 'इन प्रशिक्षकों/शिक्षकों को दिया जाने वाला मानदेय स्थिर नहीं रखा जा सकता और केंद्र सरकार/राज्य सरकार की ओर से निर्दिष्ट परियोजना स्वीकृति बोर्ड या कोई अन्य प्राधिकृत संस्था कम से कम तीन वर्ष में किसी योजना या संशोधित योजना के तहत इसे पुन: निर्धारित कर सकती है।”

उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत राज्य के उच्च प्राथमिक स्कूलों (कक्षा 6-8) में अंशकालिक प्रशिक्षकों/शिक्षकों को संविदा पर नियुक्त करने का निर्णय लिया था।

उपरोक्त कार्यक्रम के तहत, 2013 में एक विज्ञापन जारी किया गया था, जिसमें योग्य उम्मीदवारों से अंशकालिक संविदा प्रशिक्षकों/शिक्षकों की नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे।

उपरोक्त प्रक्रिया के बाद, बड़ी संख्या में शिक्षकों को 11 महीने की अवधि के लिए एक निश्चित मानदेय 7,000 रुपये प्रति माह पर संविदा पर नियुक्त किया गया, साथ ही यह शर्त रखी कि ये प्रशिक्षक/शिक्षक किसी भी अन्य स्थान पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंशकालिक या पूर्णकालिक नौकरी नहीं करेंगे।

इन प्रशिक्षकों/शिक्षकों को 11 महीने की संविदा अवधि समाप्त होने के बाद भी हर साल नवीनीकरण के आधार पर काम पर रखा गया, लेकिन उनके मानदेय को 7,000 रुपये प्रति माह पर स्थिर रखा गया, जबकि संबंधित प्राधिकारियों ने वेतन बढ़ाने की सिफारिशकी थी।

इससे नाराज होकर, शिक्षकों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उच्च न्यायालय के एकल न्यायधीश की पीठ ने मार्च 2017 से इन प्रशिक्षकों/शिक्षकों को प्रति माह 17,000 रुपये मानदेय देने का आदेश दिया।

हालांकि, एक खंडपीठ ने राज्य सरकार को केवल वर्ष 2017-2018 के लिए प्रति माह 17,000 रुपये मानदेय भुगतान करने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा कि शिक्षा राष्ट्र की प्रगति के लिए मौलिक जरूरत है और शिक्षक युवाओं के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में उन्हें पढ़ाते हैं और ऐसा करते हुए वे युवाओं के दृष्टिकोण, आचरण और आदर्शों पर गहरा प्रभाव डालते हैं।

अदालत ने कहा, 'इसलिए, यदि हम राष्ट्र के लिए एक बेहतर भविष्य चाहते हैं, तो हमें उन शिक्षकों को पहचानना, महत्व देना और समर्थन करना चाहिए, जो चरित्र निर्माण, मूल्यों को स्थापित करने और युवा पीढ़ी का मार्गदर्शन करके चुपचाप देश की नियति को आकार दे रहे हैं।”

पीठ ने कहा, “शिक्षक समाज में सर्वोच्च सम्मान के पात्र होते हैं और उन्हें भगवान के समान पूजा जाता है।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि प्राथमिक शिक्षक आगामी पीढ़ी, यानी 'भारत भाग्य विधाता' के चरित्र निर्माण के लिए जिम्मेदार होते हैं।

अदालत ने कहा, 'वे ही नयी पीढ़ी का चरित्र निर्माण करते हैं। नागरिकों का चरित्र निर्माण राष्ट्र निर्माण की नींव है। अगर यह नींव कमजोर होती है, तो राष्ट्र का पतन निश्चित है।'

पीठ ने कहा, “इसलिए, हमें अपने शिक्षकों विशेष रूप से प्राथमिक स्तर के शिक्षकों को सभी स्तरों पर, यहां तक कि सरकारी स्तर पर भी, सर्वोत्तम सम्मान और आदर देना चाहिए। उन्हें उनके काम के लिए सबसे उपयुक्त तरीके से कुछ नवाजा जाना चाहिए। दरअसल, कोई भी मानदेय हमारे शिक्षकों की ओर से की गईं सेवाओं की पूरी तरह से भरपाई नहीं कर सकता।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से नियुक्त अंशकालिक संविदा प्रशिक्षक/शिक्षक किसी भी रूप में नियमित शिक्षकों से कम नहीं हैं, क्योंकि उनके पास राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद द्वारा निर्धारित बुनियादी शैक्षिक योग्यताएं और पात्रता है।

पीठ ने कहा, 'संवैधानिक प्रावधान के तहत प्राथमिक स्तर तक मुफ्त शिक्षा प्रदान करने की अनिवार्यता को देखते हुए, राज्य सरकार योजना को त्याग नहीं सकती और उच्च प्राथमिक शिक्षा को निरर्थक नहीं बना सकती। यह अधिनियम के साथ विरोधाभासी होगा।'

भाषा जोहेब शफीक संतोष

संतोष