(फाइल फोटो के साथ)
खरगोन (मध्यप्रदेश), चार फरवरी (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह सेवा, कर्म और सामूहिक कल्याण की भावना का प्रतीक है।
जिले के कसरावद में स्थित लेपा गांव में एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि भारतीय परंपरा उपकार करने में नहीं, बल्कि सेवा की भावना में निहित है और दूसरों की सेवा करना भारत का धर्म है।
संघ की ओर से जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार सरसंघचालक ने कहा, ‘‘हमारे यहां चैरिटी नहीं, अपितु सेवा है। जीवन में सेवा के जो भी अवसर मिलें, सेवा करना चाहिये। सेवा से हमारी शुद्धि होती है। जिसके पास जो हो, वो देना चाहिये।’’
उन्होंने कहा कि दूसरों के दुखों को नजरअंदाज करते हुए खुशी का आनंद लेना मानवीय संवेदनशीलता के खिलाफ है और समाज के दर्द को कम करना भारत का अंतर्निहित स्वभाव है एवं इसी आधार पर भारत ने दुनिया को धर्म का संदेश दिया है।
उन्होंने कहा कि पराधीनता के दौर में भी भारत का यह चरित्र नहीं बदला।
'चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र-निर्माण' विषय पर अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह समाज और राष्ट्र की पीड़ा को दूर करने के लिए होना चाहिए।
भागवत ने कहा कि श्रम की गरिमा और आत्मनिर्भरता के महत्व को सीखना ही सच्ची शिक्षा है।
उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति का मतलब केवल आर्थिक विकास नहीं है, बल्कि यह जल संसाधनों, जंगलों, नदियों, पहाड़ों, जानवरों और मनुष्यों का समग्र विकास है।
विज्ञप्ति में कहा गया है कि उन्होंने कार्यक्रम के दौरान मराठी ऑडियोबुक 'गोष्ट-नर्मदालयाची' का भी विमोचन किया।
इस कार्यक्रम का आयोजन निमाड़ अभ्युदय ग्रामीण प्रबंधन एवं विकास संघ और श्री रामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
भाषा सं ब्रजेन्द्र
राजकुमार
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