नयी दिल्ली, चार फरवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने हत्या के मामले में अपील खारिज होने के बाद भी दोषी को पकड़ने में 13 साल की 'असाधारण देरी' का 'गंभीरता पूर्वक संज्ञान' लिया है और कहा है कि इस तरह की घटनाएं आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को धूमिल करती हैं।
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की पीठ ने टिप्पणी की कि इस मामले ने निचली अदालत, जेल प्रशासन और पुलिस के बीच समन्वय की कमी के कारण न्यायिक आदेशों पर अमल सुनिश्चित करने में 'गंभीर प्रणालीगत विफलता' को उजागर किया।
दोषसिद्धि और जमानत दिए जाने के बाद अपेक्षित अनुवर्ती कार्रवाई में कमियों को देखते हुए अदालत ने राय व्यक्त की कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए एक तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है और इसके लिए कई निर्देश दिए।
पीठ ने 27 जनवरी के एक आदेश में कहा, ‘‘यह उन मामलों में से एक है, जहां अपीलकर्ता ने इस अदालत द्वारा उसकी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील खारिज किए जाने के बावजूद 13 वर्षों की लंबी अवधि तक स्वतंत्रता का फायदा उठाना जारी रखा।’’
जनवरी 2009 में निचली अदालत ने अपीलकर्ता को हत्या के अपराध में दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
उच्च न्यायालय में उसकी अपील लंबित रहने के दौरान दिसंबर 2010 में उसकी सजा दो महीने के लिए निलंबित कर दी गई थी, जिसके बाद उसने आत्मसमर्पण नहीं किया। वर्ष 2012 में उच्च न्यायालय ने उसकी अपील खारिज कर दी।
अदालत ने गौर किया कि जेल अधीक्षक द्वारा दायर स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, अपीलकर्ता को 13 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया गया और फिर शेष सजा काटने के लिए जेल भेज दिया गया।
न्यायालय ने टिप्पणी की, ‘‘यह न्यायालय अपीलकर्ता को हिरासत में लेने में लगभग 13 वर्षों की असाधारण देरी का गंभीर संज्ञान लेता है, जिसकी अपील पहले ही खारिज हो चुकी थी। यह दोषसिद्धि/जमानत के बाद की कार्यवाही में खामियों और निचली अदालत, जेल प्रशासन और पुलिस के बीच समन्वय की कमी को दर्शाता है। इस तरह की असामान्य देरी न्यायिक आदेशों को लागू करने को सुनिश्चित करने में एक गंभीर प्रणालीगत विफलता को उजागर करती है। इस तरह की घटनाएं आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को धूमिल करती हैं।'
भाषा शुभम सुरेश
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