नयी दिल्ली, चार फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों द्वारा मृत्युदंड के दोषियों को बरी किए जाने की उच्च दर ‘त्रुटिपूर्ण या अनुचित दोषसिद्धि’ के पैटर्न को दर्शाती है। मृत्युदंड के 10 वर्षों के आंकड़ों के अध्ययन से पता चला है कि हाल के वर्षों में उच्चतम न्यायालय ने किसी भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की है।
हैदराबाद स्थित एनएएलएसएआर विधि विश्वविद्यालय के आपराधिक कानून की वकालत करने वाले समूह ‘स्क्वायर सर्कल क्लिनिक’ द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि अधीनस्थ अदालतों द्वारा जितने भी मामलों में फांसी की सजा सुनाई जाती है उनमें से अधिकांश उच्च न्यायिक स्तरों पर जांच में खरे नहीं उतरते।
उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय, दोनों स्तरों पर पुष्टि की गई सजाओं की तुलना में उन मामलों की संख्या कहीं अधिक थी जिनमें आरोपियों को बरी कर दिया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, देश की अधीनस्थ अदालतों ने 2016 से 2025 के बीच 822 मामलों में 1,310 मृत्युदंड सुनाए। उच्च न्यायालयों ने इनमें से 842 सजाओं की पुष्टि की कार्यवाही के तहत विचार किया, लेकिन मृत्युदंड के केवल 70 यानी 8.31 प्रतिशत मामलों को ही बरकरार रखा।
इसके विपरीत, मृत्युदंड के 258 मामलों (30.64 प्रतिशत) में आरोपी बरी किए गए। अध्ययन में पाया गया कि उच्च न्यायालय स्तर पर बरी किए जाने की दर, पुष्टि की दर से लगभग चार गुना अधिक थी।
आंकड़ों से पता चला कि उच्च न्यायालयों द्वारा पुष्टि की गई फांसी की 70 सजाओं में से 38 पर उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया और एक को भी बरकरार नहीं रखा। उच्चतम न्यायालय ने 2023 से 2025 के बीच किसी भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की है।
रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘गलत, त्रुटिपूर्ण या अनुचित दोषसिद्धि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में आकस्मिक या अप्रत्याशित घटनाएं नहीं हैं। आंकड़े बताते हैं कि यह स्थिति निरंतर गंभीर प्रणालीगत चिंता का विषय बनी हुई है।’’
पिछले एक दशक में उच्च न्यायालयों ने 647 मामलों में 1,085 लोगों को मृत्युदंड सुनाया, जिनमें से केवल 106 (9.77 प्रतिशत) की पुष्टि हुई। इस अवधि के दौरान 191 मामलों में 326 व्यक्तियों को बरी कर दिया गया।
पिछले एक दशक में उच्चतम न्यायालय ने जिन 153 मृत्युदंड पर विचार किया उनमें से 38 मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया गया।
भाषा संतोष सुरेश
सुरेश