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इसरो का एसएसएलवी-डीथ्री-ईओएस-ऐट भारत के लिए क्यों है इतना खास?

भारत के लिए गर्व की बात है  कि इसरो ने 16 अगस्त को 175.5 किलोग्राम वजन के ईओएस-ऐट यानी अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट-ऐट को कामयाबी के साथ लॉन्च किया। श्रीहरिकोटा से ये सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुंचा, जिसने स्पेस टेक्नोलॉजी देश की बढ़ती महारथ की झलक पेश की।

सिर्फ इतना ही नहीं, इस लॉन्च ने भारत के लेटेस्ट इनोवेशन स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल एसएसएलवी-डीथ्री से दुनिया को रुबरु कराया। ये छोटा सैटेलाइट लॉन्चर है। ये भारतीय वैज्ञानिकों की काबिलियत का दोहरा जश्न है, जो देश के इनोवेशन और एक्सीलेंस में एक और मील का पत्थर साबित होगा।

एसएसएलवी- डीथ्री मिशन ने दो सैटेलाइटों को उनकी इच्छित कक्षाओं में कामयाबी से स्थापित किया है। ये हैं, अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट- ईओएस-ऐट और पैसेंजर सैटेलाइट- एसआर-जीरो डेमोसैट।

ये भारत को अंतरिक्ष में सुपर-पावर्ड आंखों का नया सेट देने जैसा है। ये सैटलाइट इन्फ्रारेड का इस्तेमाल करके देख सकता है। इसका मतलब है कि ये जंगल की आग को देख सकता है, पर्यावरण परिवर्तनों को ट्रैक कर सकता है और आपदा प्रबंधन में भी मदद कर सकता है। ईओएस-ऐट, मिट्टी की नमी की स्टडी करने, बाढ़ का पता लगाने और यहां तक ​​कि वैज्ञानिकों को भविष्य के लिए तैयार करने में भी मदद करने के लिए जरूरी चीजों से लैस है।

एसएसएलवी स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च मार्केट में गेम चेंजर है। ये बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए कॉस्ट इफेक्टिव और फ्लेक्सिबल सॉल्यूशन देता है। 10 से 500 किलो वजन वाले मिनी, माइक्रो या नैनो सैटेलाइटों को 500 किलोमीटर के प्लेनर ऑर्बिट में भेजने की अपनी क्षमताओं के साथ, ये इसरो का आखिरी एसएसएलवी मिशन है। भविष्य के मिशन की जिम्मेदारी चुने गए वाणिज्यिक व्यवसायों की होगी। कम से कम छह कंपनियां पहले से ही टेक्नोलॉजी का अधिग्रहण करने के लिए तैयार हैं।