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राष्ट्र और देश में क्या फर्क है? राम विशाल दास महाराज ने समझाया राष्ट्रवाद का असली मतलब

29 मार्च को जयपुर में ‘संत संसद 2026’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन भक्ति भाव के साथ किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन नेटवर्क10 न्यूज चैनल द्वारा किया गया, जिसमें देशभर से अनेक साधु-संतों, महामंडलेश्वरों और धार्मिक हस्तियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य विषय था— “अब नहीं होगा जात-पात, बात होगी सिर्फ राष्ट्रवाद”। इस विषय पर सभी संतों ने अपने विचार रखते हुए समाज में एकता, समरसता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने पर जोर दिया।

इस अवसर पर तीर्थाचार्य राम विशाल दास जी महाराज भी मौजूद रहे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि देश में संस्कार बसने चाहिए। उन्होंने अपने साधु-संतों से निवेदन करते हुए कहा कि आजकल गुरुकुल केवल कर्मकांड तक सीमित हो गए हैं। कई जगह आश्रमों में गुरुकुल इस सोच से खोले जा रहे हैं कि वहां मुफ्त में सेवक मिल जाएं, जबकि गुरुकुल की व्यवस्था इससे कहीं बड़ी और महान रही है।

महाराज ने कहा कि इस देश में कभी नालंदा और तक्षशिला जैसे महान गुरुकुल थे। उन गुरुकुलों की परिकल्पना, निर्माण और पुनर्जागरण हमें फिर से करना होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि ऐसा करने से अखंड भारत का सपना साकार होगा, राष्ट्रवाद की भावना घर-घर तक पहुंचेगी और भारत एक बार फिर विश्व गुरु बनेगा।

अपने संबोधन में महाराज ने जातिवाद और राष्ट्रवाद पर भी बात की। उन्होंने कहा कि अगर ‘वाद’ शब्द जाति के साथ जुड़ता है तो वह समाज में समस्या पैदा करता है, लेकिन जब ‘वाद’ राष्ट्र के साथ जुड़ता है तो वह आत्मसम्मान और राष्ट्र गौरव की भावना को मजबूत करता है।

उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्र और देश अलग-अलग होते हैं। देश सीमाओं से बंधा होता है, जबकि राष्ट्र संस्कृति और संस्कारों से बनता है। बिना संस्कृति और संस्कारों के राष्ट्र की कल्पना संभव नहीं है। हमारा राष्ट्र अखंड भारत की भावना से जुड़ा है और भारतीय संस्कृति व संस्कारों को पूरी दुनिया तक पहुंचाना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।

महाराज ने कहा कि सच्चा राष्ट्रवाद केवल बातों से नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों से आता है। इसमें प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, गाय की रक्षा, पर्यावरण, जल, हिमालय और ग्लेशियरों का संरक्षण, तथा सभी जीवों के प्रति दया का भाव रखना शामिल है। साथ ही, मतभेदों को भुलाकर एकता के साथ रहना भी जरूरी है।

अंत में उन्होंने सभी से आह्वान किया कि वे राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करें और एकजुट होकर भारत को फिर से महान और समृद्ध बनाने में योगदान दें।