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अवैध और असुरक्षित इमारतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दिल्ली समेत कई शहरों से मांगी कार्रवाई रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में अवैध और असुरक्षित इमारतों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने दिल्ली, गुरुग्राम, लखनऊ, पटना और तमिलनाडु की नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे ऐसी इमारतों के खिलाफ की गई कार्रवाई की स्टेटस रिपोर्ट अदालत में पेश करें।

न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ ने हाल ही में दिल्ली के साकेत में इमारत गिरने और मालवीय नगर (दिल्ली) व अलीगंज (लखनऊ) में आग लगने की घटनाओं का संज्ञान लेते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने अधिकारियों को 20 मई के अपने पहले दिए गए निर्देशों के अनुपालन में की गई कार्रवाई की जानकारी देने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि आईआईटी दिल्ली के दो वरिष्ठ प्रोफेसरों और दो ड्राफ्ट्समैन की एक विशेष टीम बनाई जाए। यह टीम साकेत, मालवीय नगर और लाजपत नगर में समयबद्ध तरीके से जमीनी सर्वे करेगी। इस सर्वे में दिल्ली नगर निगम (MCD) के अधिकारी भी साथ रहेंगे। सरोजिनी नगर में भी इसी प्रकार का सर्वे किया जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि इस प्रक्रिया में "कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए" और समिति को ईमानदार रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि रिपोर्ट की सत्यता पर संदेह हुआ तो वह अपनी ओर से विशेष टीम भेज सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस क्यूरी की इस बात से सहमति जताई कि भवन गिरने या आग लगने की घटनाओं के बाद अधिकारी केवल बिल्डरों की गिरफ्तारी करके "औपचारिक कार्रवाई" दिखा रहे हैं, जबकि अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि संबंधित प्राधिकरण अपनी रिपोर्ट में उन वरिष्ठ अधिकारियों के नाम भी बताएं, जिनकी लापरवाही के कारण अवैध निर्माणों के खिलाफ समय पर कार्रवाई नहीं हुई। गुरुग्राम में 93 प्रतिशत प्रतिष्ठानों द्वारा अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन न करने संबंधी समाचार रिपोर्ट का भी कोर्ट ने संज्ञान लिया। इस मामले में गुरुग्राम विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि 4 अगस्त तक अधिकारी कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल नहीं करते या कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करते, तो संबंधित नगर आयुक्तों, सीईओ और अन्य अधिकारियों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेकर अवमानना की कार्रवाई शुरू की जा सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अगली सुनवाई तक भी अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पर तय की जाएगी।