Jaipur: 29 मार्च को जयपुर में ‘संत संसद 2026’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन नेटवर्क 10 न्यूज़ चैनल द्वारा किया गया, जिसमें देशभर से कई संतों ने भाग लिया। प्रमुख संतों में जगद्गुरु शंकराचार्य राज राजेश्वराश्रम जी महाराज भी शामिल हुए।
कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में जगद्गुरु शंकराचार्य ने ‘संत’ और ‘संन्यासी’ के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि संत होना एक स्वभाव है, यह भीतर के जागरण का प्रतीक है, जबकि संन्यास एक प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि संन्यासी बनना आसान नहीं होता, यह लाखों में किसी एक के हिस्से आता है।
अपने भाषण के बीच हल्के-फुल्के अंदाज में उन्होंने नेटवर्क 10 के एडिटर-इन-चीफ संजय गिरी गोस्वामी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि संन्यासी होना कठिन है, इसलिए संजय गिरी जी ‘संत संसद’ का आयोजन करते हैं, ‘संन्यासी संसद’ से वे भी बचते हैं।
इस टिप्पणी पर कार्यक्रम में उपस्थित लोगों के बीच हल्की मुस्कान देखी गई। जगद्गुरु शंकराचार्य ने आगे कहा कि संन्यास के जीवन में कठोरता और मर्यादा का विशेष महत्व होता है। संन्यास का मार्ग दोधारी तलवार के समान है, जिस पर चलना अत्यंत कठिन और अनुशासनपूर्ण होता है।