प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 मई को प्रस्तावित सोमनाथ मंदिर यात्रा से पहले शुक्रवार को एक लेख साझा किया, जिसमें उन्होंने मंदिर के सभ्यतागत महत्व पर प्रकाश डाला और सदियों तक इसकी रक्षा एवं पुनर्निर्माण करने वालों को श्रद्धांजलि दी। एक्स पर पोस्ट करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा,
“11 मई को सोमनाथ की मेरी आगामी यात्रा और इस दिन के सोमनाथ तथा हमारी सभ्यता की महानता के संदर्भ में महत्व पर एक लेख लिखा है। साथ ही उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की है जिन्होंने हर प्रकार की चुनौतियों का सामना करते हुए हमेशा सोमनाथ की रक्षा की और उसकी गौरवशाली पहचान को पुनर्स्थापित किया।”
अपने लेख में प्रधानमंत्री ने कहा कि यह यात्रा पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के 75 वर्ष पूरे होने का प्रतीक होगी, जिसका उद्घाटन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था। मोदी ने इस वर्ष आयोजित ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का भी उल्लेख किया, जो मंदिर पर पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित हुआ था। उन्होंने सोमनाथ की यात्रा को “विध्वंस से सृजन” की यात्रा बताया।
प्रधानमंत्री ने लिखा, “सोमनाथ हमें सभ्यतागत संदेश देता है।” उन्होंने कहा कि यह मंदिर बार-बार हुए आक्रमणों और विनाश के बावजूद भारत की आस्था, धैर्य और निरंतरता का प्रतीक बना रहा। मोदी ने सोमनाथ की रक्षा और पुनर्निर्माण से जुड़े कई ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को याद किया, जिनमें सरदार वल्लभभाई पटेल, केएम मुंशी, अहिल्याबाई होल्कर और डॉ. राजेंद्र प्रसाद शामिल हैं।
उन्होंने लिखा, “साम्राज्य उठे और गिरे, इतिहास ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन सोमनाथ हमारी चेतना में सदैव जीवित रहा। यह उन महान लोगों को याद करने का समय है जिन्होंने अत्याचार के सामने डटकर संघर्ष किया। लकुलीश और सोम शर्मा ने प्रभास को दर्शन का बड़ा केंद्र बनाया। वल्लभी के चक्रवर्ती महाराजा धारसेन चतुर्थ ने यहां दूसरा मंदिर बनवाया। भीमदेव, जयपाल और आनंदपाल सभ्यतागत सम्मान की रक्षा के लिए हमेशा याद किए जाएंगे।”
स्वतंत्रता के बाद मंदिर पुनर्निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पटेल ने इसे “पवित्र कार्य” बताया था। मोदी ने लिखा, “1940 के दशक में जब स्वतंत्रता की भावना पूरे भारत में फैल रही थी और सरदार पटेल जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में नए गणराज्य की नींव रखी जा रही थी, तब भी सोमनाथ की स्थिति उन्हें गहराई से विचलित करती थी। 13 नवंबर 1947 को उन्होंने मंदिर के खंडहरों के पास समुद्र का जल हाथ में लेकर कहा था — ‘इस शुभ नववर्ष के दिन हमने निर्णय लिया है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण किया जाएगा। सौराष्ट्र के लोगों को इसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देना चाहिए। यह एक पवित्र कार्य है जिसमें सभी को भाग लेना चाहिए।’”
प्रधानमंत्री ने कहा कि दुर्भाग्यवश सरदार पटेल अपने इस सपने को पूरा होते नहीं देख सके। उन्होंने कहा, “पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खुलने से पहले ही सरदार पटेल इस दुनिया से विदा हो गए। उनके इस संकल्प को केएम मुंशी और जामसाहेब नवानगर ने आगे बढ़ाया।” मोदी ने कहा कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण केवल आध्यात्मिक पुनर्जागरण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक निरंतरता का भी प्रतीक है।
उन्होंने “विकास भी, विरासत भी” के विजन का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार ने देश के प्रमुख तीर्थस्थलों का आधुनिकीकरण करते हुए उनकी पारंपरिक पहचान को सुरक्षित रखने का प्रयास किया है। प्रधानमंत्री ने लिखा, “‘विकास भी, विरासत भी’ के सिद्धांत से प्रेरित होकर हमारी टीम को सोमनाथ से काशी, कामाख्या से केदारनाथ, अयोध्या से उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर से श्रीशैलम तक आध्यात्मिक केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित करने और उनकी पारंपरिक पहचान को संरक्षित रखने का अवसर मिला है।”
प्रधानमंत्री ने यह भी घोषणा की कि सोमनाथ की रक्षा और पुनर्निर्माण के लिए बलिदान देने वालों की स्मृति में अगले 1000 दिनों तक विशेष पूजा आयोजित की जाएगी। उन्होंने कहा, “सोमनाथ की रक्षा के लिए बलिदान देने वालों और इसे बार-बार पुनर्स्थापित करने वालों के संघर्ष और त्याग को कभी भुलाया नहीं जाएगा। एक हजार वर्षों के अद्भुत साहस को स्मरण करते हुए अगले हजार दिनों तक विशेष पूजाएं आयोजित की जाएंगी। यह देखकर खुशी होती है कि कई लोग इन पूजाओं के लिए दान भी दे रहे हैं।”
अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से इस विशेष समय में सोमनाथ आने की अपील करते हुए कहा, “मैं अपने सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं कि वे इस विशेष समय में सोमनाथ अवश्य आएं। यहां आप भारत की अजेय आत्मा का अनुभव करेंगे और समझ पाएंगे कि तमाम प्रयासों के बावजूद हमारी संस्कृति कभी पराजित नहीं हुई। यहां आपको सनातन विजय के दर्शन होंगे। यह अनुभव निश्चित रूप से अविस्मरणीय रहेगा।”