Uttarakhand: "गेम ऑफ थ्रोन्स" की खून से भरी दुनिया और देहरादून की शांत पहाड़ियां, दोनों में बहुत फर्क है। फिर भी बहुत कम लोग ये बात जानते हैं कि इस खास सीरीज में इस्तेमाल किए जाने वाले धारदार खंज़र हों या चमचमाती तलवारें या फिर खास कवच, सब कुछ किसी बड़े वेर्स्टन स्टूडियों या ग्लोबल मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी में नहीं बल्कि देहरादून में ही तैयार किए हैं।
देहरादून स्थित लॉर्ड ऑफ बैटल्स की कार्यशाला के अंदर, हथौड़ों और पिघली हुई धातु की आवाज़ें गूंजती रहती हैं। जानकार कारीगर अपने हाथों से तलवारें, ढालें, चेनमेल और गॉबलेट जैसी चीजें बनाते हैं। ये कारीगर अपने हुनर से कच्चे माल को शानदार फिल्मी सामान में बदल देते हैं। ये सब कैप्टन सौरभ महाजन की देखरेख में होता है जो अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए सेना में गए और बख्तरबंद कोर की 6 लांसर्स रेजिमेंट में सेवा की।
उन्होंने 2005 में समय से पहले ही रिटायरमेंट ले लिया। उस वक्त उनके पास न तो कोई फैक्ट्री थी और न ही कोई टीम थी लेकिन इतिहास से उनका प्यार बेशुमार था। बचत के नाम पर उनके पास सिर्फ चार से पांच लाख रुपये थे। उनमें अनुशासन कूट-कूट के भरा था जो उन्होंने सेना से सीखा था। तभी उनकी मुलाकात एक ऑस्ट्रेलियाई महिला से हुई। और फिर तो उनकी दुनिया ही बदल गई।
ऑस्ट्रेलियाई थिएटर के लिए कुछ छोटी चीजें बनाने से हुई शुरूआत ने जल्द ही बड़े पैमाने पर इनमें इस्तेमाल होने हथियारों की शक्ल ले ली। डेडलाइन को पूरा करने में महाजन के सैन्य-शैली के अनुशासन ने जादू कर दिया। जल्द ही ग्लोबल एपिक से जुड़े बड़े नाम उनके साथ जुड़ चुके थे। और फिर लॉर्ड ऑफ बैटल्स के महारथियों का शिल्प कौशल जल्द ही हॉलीवुड की दुनिया और सुनहरे पर्दे पर चमकने लगा।
हालांकि महाजन याद करते हैं कि वास्तविक मोड़ 2014 में तब आया जब "गेम ऑफ थ्रोन्स" के सीजन फोर के लिए ऑर्डर उन्हें मिला। इसके तुरंत बाद सीजन फाइव के लिए भी पेशकश आ गई। देहरादून में महज तीन कारीगरों से शुरू हुआ लॉर्ड ऑफ बैटल के साथ आज 200 से ज्यादा कुशल कारीगर जुड़े हुए हैं। कंपनी की मैन्यूफैक्चरिंग यूनिटें उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, अलीगढ़ और मुरादाबाद में हैं।
महाजन की कंपनी ने "गेम ऑफ थ्रोन्स" के चौथे और पांचवें सीजन के लिए 3.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर की बड़ी रकम हासिल की। लेकिन उनके लिए अपनी पहली कमाई के तौर पर ऑस्ट्रेलियाई ग्राहक से रकम हासिल करने का रोमांच खास है। दिलचस्प बात ये है कि अक्सर महाजन और उनकी टीम को य् पता ही नहीं होता कि वे किस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। उन्हें न टाइटल पता होता है, न किरदार और न ही कहानी। उन्हें बस ये पता होता है कि क्या और कितना तैयार करना है।
रहस्य तभी खुलता है जब ट्रेलर रिलीज़ होता है या फ़िल्म सिनेमाघरों में आती है। तभी महाजन और उनकी पूरी टीम सिनेमाघर पहुंचती है - सभी अपने हाथों से बनाई हुई चीजों को बड़े पर्दे पर देखने के लिए रोमांचित रहते हैं।
इतिहास से लगाव रखने वाले महाजन ने कई हॉलीवुड प्रोडक्शन पर काम किया है। फिलहाल उनके पास कोई बॉलीवुड प्रोजेक्ट नहीं है - लेकिन अगर सही मौका मिले तो वे इसमें शामिल होने के लिए तैयार हैं। उनका ड्रीम प्रोजेक्ट एक ऐसी फिल्म है जो मुगल काल की झलक पेश करती हो। लॉर्ड ऑफ बैटल्स की शुरुआत देहरादून में एक छोटी सी चिंगारी के रूप में हुई थी, लेकिन आज ये सिनेमाई शिल्प कौशल में वैश्विक विरासत को रोशन कर चुकी है।