New Delhi: गर्मी के मौसम में लोगों की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। खुले आसमान के नीचे काम करने वाले मजदूर, बिना छांव के सड़क किनारे सामान बेचने वाले, टिन की छत वाले घर में रहने वाले लोगों की जिंदगी खास कर दोपहर में असहनीय होती जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने चेतावनी दी है कि अब हर साल भीषण गर्मी से बाढ़, तूफान और जंगल की आग के मामले बढ़ रहे हैं। इनसे कहीं ज्यादा लोगों की मौत हो रही है। भारत में अनौपचारिक क्षेत्र के करीब 82 फीसदी मजदूर हर रोज भीषण गर्मी का सामना करते हैं, जबकि वे देश की लगभग आधी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
वातावरणीय नमी में कमी की वजह से कुछ शहरों का अधिकतम तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच जाता है। पर्यावरण के जानकार इसे खतरनाक बताते हैं। शहरी इलाके ज्यादा संवेदनशील हैं। कंक्रीट और डामर गर्मी को बढ़ाते हैं, जिससे गांवों के मुकाबले शहरों का तापमान कहीं ज्यादा होता है।
जिनके पास एयर कंडीशनिंग की सुविधा नहीं है, उनके लिए गर्मी में परेशानियां और बढ़ जाती हैं। हालांकि संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भीषण गर्मी का समाधान एयर कंडीशनर नहीं, बल्कि शहरों को प्राकृतिक रूप से शीतल बनाना है।
ठंडी छतें, बेहतर वेंटिलेशन, छायादार सार्वजनिक जगह, परावर्तक सतहें और हरियाली जैसे उपाय तापमान कम करने के साथ-साथ ऊर्जा की खपत और लागत कम करने में मदद बन सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र की 'बीट द हीट' पहल के तहत, 44 भारतीय शहर गर्मी से निपटने की योजनाओं को लागू करने का प्रयास कर रहे हैं। इस कोशिश में 40 देशों के 230 से ज्यादा शहर जुटे हुए हैं।
हालांकि संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों का कहना है कि संवेदनशील आबादी को किफायती और टिकाऊ शीतलन समाधान उपलब्ध कराने के लिए अभी काफी कुछ करने की जरूरत है। जानकारों का मानना है कि शीतलन उपायों में लगातार निवेश और उत्सर्जन कम करने से ही असली समाधान मिलेगा। ये वो कारक हैं, जो हर गर्मी को पिछली गर्मी के मुकाबले बदतर बना रहे हैं।