गोरक्षपीठ के राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि पर बुधवार, 30 सितंबर को गोरखनाथ मंदिर में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाएगी। गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में होने वाली इस सभा में देशभर के संत और धर्माचार्य शामिल होंगे।
महंत अवेद्यनाथ का जीवन राम मंदिर आंदोलन, सामाजिक समरसता और लोककल्याण के लिए समर्पित रहा। नाथपंथ की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के साथ राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्हें श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण आंदोलन के प्रमुख संत नेताओं में गिना जाता है।
श्रीराम मंदिर निर्माण रहा प्रमुख मिशन
महंत अवेद्यनाथ ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को अपने जीवन के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल किया। गोरक्षपीठ की तीन पीढ़ियों ने राम मंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महंत दिग्विजयनाथ के बाद आंदोलन की कमान महंत अवेद्यनाथ ने संभाली।
21 जुलाई 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ और महंत अवेद्यनाथ को सर्वसम्मति से इसका अध्यक्ष चुना गया। वह जीवनभर इस समिति के अध्यक्ष रहे। उन्होंने संतों, धर्माचार्यों, राजनीतिज्ञों और आम लोगों को आंदोलन से जोड़ने में भूमिका निभाई। आगे चलकर उनके शिष्य और वर्तमान गोरक्षपीठाधीश्वर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।
सामाजिक समरसता के लिए चलाया अभियान
महंत अवेद्यनाथ ने हिंदू समाज में छुआछूत और जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए लगातार अभियान चलाया। उन्होंने विभिन्न सामाजिक वर्गों को एक साथ लाने के लिए सहभोज की परंपरा को बढ़ावा दिया।
दक्षिण भारत के मीनाक्षीपुरम में दलित समाज के सामूहिक धर्मांतरण की घटना के बाद उन्होंने सामाजिक कुरीतियों और जातिगत विभाजन को दूर करने पर विशेष जोर दिया। दलित बस्तियों में सहभोज के जरिए उन्होंने सामाजिक एकता का संदेश दिया।
काशी में डोमराजा के घर संतों और साधु समाज के साथ भोजन कर उन्होंने सामाजिक समरसता का संदेश दिया। उनके जीवन में दलित और वंचित समाज के लोगों के साथ सहभोज का सिलसिला लगातार चलता रहा।
श्रीराम और मां दुर्गा के उदाहरण से समझाते थे एकता
महंत अवेद्यनाथ के जीवन पर शोध करने वाले डॉ. प्रदीप कुमार राव के अनुसार, वह सामाजिक समरसता की बात सरल उदाहरणों के जरिए समझाते थे। वह भगवान श्रीराम के शबरी के बेर खाने, निषादराज को गले लगाने और जटायु का अंतिम संस्कार करने जैसे प्रसंगों का उल्लेख करते थे।
इसी तरह देवी दुर्गा की आठ भुजाओं का उदाहरण देते हुए वह समाज के अलग-अलग वर्गों की एकता को सामूहिक शक्ति का प्रतीक बताते थे। उनका संदेश था कि समाज के विभिन्न वर्ग एकजुट होकर मजबूत सामाजिक शक्ति का निर्माण कर सकते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में भी बढ़ाया काम
महंत अवेद्यनाथ ने अपने गुरुदेव महंत दिग्विजयनाथ के शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों को आगे बढ़ाया। उनके प्रयासों से महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद का विस्तार हुआ। परिषद के अंतर्गत प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा और सेवा से जुड़े कई संस्थान संचालित हो रहे हैं। इन संस्थानों में बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
राजनीति में भी रहा लंबा सफर
महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति में भी लंबी भूमिका निभाई। उन्होंने 1962, 1967, 1969, 1974 और 1977 में मानीराम विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 1970, 1989, 1991 और 1996 में गोरखपुर सदर लोकसभा सीट से सांसद रहे।
वह अखिल भारतीय हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष और महासचिव के रूप में भी सक्रिय रहे। उनके राजनीतिक जीवन में राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति, शिक्षा और हिंदू समाज की एकता जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
30 सितंबर को होगी श्रद्धांजलि सभा
महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उनके धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक योगदान को याद किया जाएगा। गोरखनाथ मंदिर में होने वाले इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ देशभर से आने वाले संत और धर्माचार्य उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।