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भारत में मानसून के मौसम में गर्मी और उमस से बढ़ सकता है असहनीय ताप का प्रकोप

नयी दिल्ली, आठ जून (भाषा) अगर वैश्विक तापमान दो डिग्री सेल्सियस और बढ़ा, तो भारत में मानसून के समय पड़ने वाली भारी उमस और गर्मी के कारण लोगों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। इससे गर्मियों के मौसम में होने वाली जानलेवा एवं असहनीय गर्मी का असर और अधिक समय तक बना रहेगा। इसे ‘अनकंपेन्सबल हीट स्ट्रेस’ (ओएचएस) कहा जाता है। एक अध्ययन में यह जानकारी दी गयी है।

‘‘अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन (एजीयू) एडवांसेज’’ नामक पत्रिका में छपे निष्कर्षों में ‘‘मानसून के मौसम (जुलाई-अक्टूबर) में असहनीय ताप के प्रकोप पर जोर दिया गया है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर और अमेरिका के स्टैनफोर्ड और पर्ड्यू विश्वविद्यालयों के अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि दोनों मौसमों –गर्मी और मानसून- में लंबे समय तक चलने वाला असहनीय ‘हीट स्ट्रेस’ घनी आबादी वाले और संवेदनशील इलाकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रम उत्पादकता और जलवायु लचीलेपन के लिए बड़ी चुनौतियां खड़ी कर सकता है।

यूएचएस तब होता है जब बहुत ज़्यादा गर्मी और नमी के कारण किसी का शरीर पसीने या दूसरे तरीकों से ठंडा नहीं हो पाता। लगातार गर्मी होने से इंसान के स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है, जिसमें गर्मी से जुड़ी बीमारियां, अंगों के निष्क्रय होने का खतरा और मौत शामिल हैं।

अध्ययन से पता चलता है कि 1979-2021 की अवधि में, असंतुलित स्तर पर ओएचएस की घटना कई बार हुई है और यह देशभर के अधिकतर इलाकों को प्रभावित कर रहा है।

यूएचएस की स्थिति मार्च-जून के गर्मियों के महीनों में ज़्यादा पाई गई, जिससे भारत का आठ प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ और यह सालाना गर्मी से होने वाली मौत के मामलों से भी जुड़ा हुआ था।

अनुसंधानकर्ताओं ने लिखा, ‘‘हालांकि, उमस वाली खतरनाक गर्मी बहुत तेजी से बढ़ेगी। अगर दुनिया का तापमान औद्योगिक काल से पहले के मुकाबले दो डिग्री और बढ़ा, तो मानसून की यह गर्मी देश के लगभग उतने ही बड़े हिस्से को परेशान करेगी, जितना गर्मियों के मौसम में असर होता है। उस वक्त देश का 60 प्रतिशत हिस्सा गर्मियों में और 53 प्रतिशत हिस्सा मानसून में इस खतरनाक गर्मी की चपेट में होगा।’’

भाषा वैभव सुरेश

सुरेश