(आलिंद चौहान)
नयी दिल्ली, पांच जून (भाषा) राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में औद्योगिक उत्सर्जन की निगरानी और नियंत्रण के लिए कई नियामक तंत्र होने के बावजूद, उनकी प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए आवश्यक जानकारी अब भी खंडित है और अक्सर उसे प्राप्त करना मुश्किल होता है। एक नये विश्लेषण में यह बात सामने आयी है।
‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ (सीएसई) के इस विश्लेषण में सामने आया है कि उत्सर्जन निगरानी से जुड़ा डेटा सार्वजनिक पोर्टलों पर असंगत रूप से उपलब्ध है और परिवेशीय वायु गुणवत्ता निगरानी रिपोर्ट अक्सर विभिन्न प्रशासनिक प्रणालियों में बिखरी हुई हैं।
सीएसई की ‘धुएं के पीछे: राष्ट्रीय राजधानी में औद्योगिक ईंधन उपयोग, उत्सर्जन निगरानी एवं नियामकीय खामियां’ नामक रिपोर्ट के अनुसार इससे क्षेत्र में औद्योगिक उत्सर्जन की पारदर्शिता और निगरानी में गंभीर कमी आई है।
सीएसई की संपोषणीय औद्योगीकरण इकाई के कार्यक्रम निदेशक निवित कुमार यादव ने शुक्रवार को ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि विश्लेषण से पता चलता है कि क्षेत्र में प्रदूषण की समस्या की जड़ केवल सर्दियों में होने वाली वृद्धि ही नहीं बल्कि गर्मियों के महीनों के दौरान डेटा-आधारित कार्रवाई की कमी भी है।
उन्होंने कहा, ‘‘जब तक नियामक निकायों को डेटा संकलन, विश्लेषण और डेटा-आधारित निर्णय लेने तथा तदनुसार योजना बनाने की क्षमता से युक्तकर उन्हें मजबूत नहीं बना दिया जाता है, तब तक विशाल निगरानी नेटवर्क व्यावहारिक रूप से बेकार ही रहेगा।’’
विश्लेषण के लिए, लेखकों ने 10-20 नवंबर, 2025 की अवधि के दौरान राजस्थान और हरियाणा के एनसीआर क्षेत्र में स्थित 142 औद्योगिक इकाइयों के लिए ‘रीयल-टाइम डेटा मॉनिटरिंग सिस्टम प्लेटफॉर्म’ से निरंतर उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (सीईएमएस) डेटा का अध्ययन किया।
सीईएमएस डेटा से उद्योगों से उत्सर्जित धुंए और अपशिष्ट जल से होने वाले प्रदूषकों की मात्रा का पता चलना चाहिए।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने पाया कि पड़ताल की गई औद्योगिक इकाइयों में से केवल 58 इकाइयों (40.8 प्रतिशत) के पास ही सीईएमएस डेटा डाउनलोड और विश्लेषण के लिए उपलब्ध था।
शेष 84 इकाइयों (59.2 प्रतिशत) के पास या तो डेटा उपलब्ध नहीं था या डेटा प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न करने वाले प्रतिबंध थे।
भाषा राजकुमार पवनेश
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