मुंबई, छह अप्रैल (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने पश्चिम एशिया संघर्ष में मारे गए 25 वर्षीय नाविक के पार्थिव अवशेष की डीएनए जांच कराए जाने के परिवार के अनुरोध पर सोमवार को उपमहानिदेशक (जहाजरानी) से जवाब मांगा।
दीक्षित सोलंकी की चार मार्च को उस समय मृत्यु हो गई जब ओमान तट के पास तेल टैंकर एमटी एमकेडी व्योम पर ड्रोन से हमला किया गया। 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले के बाद शुरू हुए संघर्ष की चपेट में आने वाले वह पहले भारतीय थे।
उनके पिता अमृतलाल और बहन मिताली ने पिछले सप्ताह उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर केंद्र सरकार को उनके पार्थिव अवशेष को भारत लाने का निर्देश देने का अनुरोध किया था। उनकी याचिका में अधिकारियों की ओर से स्पष्टता की कमी का दावा किया गया था।
सोमवार को, उनके वकील पी. तालेकर ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की पीठ से कहा कि पार्थिव अवशेष रविवार को भारत लाया गया लेकिन पार्थिव अवशेष भारत लाने वाली कंपनी ने परिवार से पहले प्राथमिकी दर्ज कराने और डीएनए परीक्षण कराने को कहा।
उन्होंने कहा, “पीड़ित का शव नहीं है, इसलिए पहचान संभव नहीं है। केवल चार-पांच जली हुई हड्डियां मिली हैं। डीएनए परीक्षण आवश्यक है ताकि परिवार अंतिम संस्कार कर सके।’’
याचिकाकर्ताओं ने सोमवार को प्राथमिकी दर्ज करने और पार्थिव अवशेष के डीएनए परीक्षण का निर्देश देने के लिए अंतरिम आवेदन दायर किया।
तालेकर ने पांच अप्रैल को उपमहानिदेशक (जहाजरानी) द्वारा याचिकाकर्ता को भेजे गए एक ईमेल का हवाला दिया, जिसमें जहाजरानी कंपनी से परिवार को हर संभव सहायता देने का अनुरोध किया गया था ताकि डीएनए परीक्षण जल्द से जल्द कराया जा सके।
पीठ ने जानना चाहा कि ऐसे मामलों में सामान्यतः क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को तय की गई और उपमहानिदेशक से इस मुद्दे पर जवाब मांगा गया।
भाषा अविनाश प्रशांत
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