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बकिंघमशायर में संत संसद का तीसरा दिन, भारतीय संस्कृति और संस्कारों के पुनर्जागरण पर हुआ मंथन

लंदन/बकिंघमशायर: ब्रिटेन के बकिंघमशायर स्थित आइवर के दर्शन दरबार में आयोजित संत संसद के तीसरे दिन विश्वभर से आए संत-महात्माओं ने भारतीय संस्कृति, संस्कार, सभ्यता और सनातन परंपराओं के पुनर्जागरण पर मंथन किया। विदेश की धरती पर सचखंड नानक धाम, सिद्धाश्रम और नेटवर्क 10 न्यूज चैनल की ओर से आयोजित इस संत संसद का तीसरे दिन का विषय ‘भारतीय संस्कृति एवं भारतीय संस्कारों का पुनर्जागरण कैसे हो’ रहा। तीसरे दिन की संत संसद की अध्यक्षता परमार्थ निकेतन आश्रम के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती महाराज ने की। कार्यक्रम में श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज, हजूर महाराज त्रिलोचन दास, राजेश्वर गुरु महाराज समेत देश-विदेश से आए कई संत-महात्माओं ने अपने विचार रखे।

‘गुरु की शिक्षा जीवन को सही दिशा देती है’

स्वामी चिदानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि गुरु ही मनुष्य के जीवन को सही दिशा और दशा प्रदान करते हैं। गुरु की शिक्षाओं को जीवन में उतारने से संस्कार और नैतिक मूल्य विकसित होते हैं। उन्होंने धर्मग्रंथों और शास्त्रों के अध्ययन के साथ गुरु-वाणी को हृदय में धारण करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति के भीतर सकारात्मक परिवर्तन आता है तो उसका प्रभाव समाज पर पड़ता है और समाज के परिवर्तन से पूरे संसार में सकारात्मक बदलाव संभव होता है।

‘बच्चे सही मार्ग पर चलेंगे तभी संस्कृति का पुनर्जागरण होगा’

श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि माता-पिता बच्चे के प्रथम गुरु होते हैं। मां बच्चे में प्रेम, करुणा और संस्कारों के बीज बोती है, जबकि पिता उसे अनुशासन और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाता है। गुरु बच्चे को धर्म और ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों की गलतियों पर केवल डांटने के बजाय उन्हें प्रेमपूर्वक समझाना और सही-गलत का अंतर बताना जरूरी है। उन्होंने कहा, “बच्चे सही मार्ग पर चलेंगे तभी भारतीय संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं का वास्तविक पुनर्जागरण हो सकेगा।” उन्होंने आधुनिक शिक्षा के साथ नई पीढ़ी को धर्म, अध्यात्म, राष्ट्र, संस्कृति और भारतीय जीवन-मूल्यों से जोड़ने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

‘अपने अनुभव और ज्ञान अगली पीढ़ी को देना होगा’

संत संसद के आयोजक हजूर महाराज त्रिलोचन दास ने कहा कि हर व्यक्ति का दायित्व है कि वह अपने जीवन के अनुभव और अर्जित ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाए। उन्होंने कहा कि ज्ञान को अपने तक सीमित रखने के बजाय आने वाली पीढ़ी को सौंपना चाहिए। ज्ञान का प्रकाश अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचेगा, तभी भारतीय संस्कृति और परंपराओं का पुनर्जागरण संभव होगा।

वहीं, सिद्धाश्रम के संस्थापक राजेश्वर गुरु महाराज ने कहा कि जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, मनुष्य को भगवान और गुरु के चरणों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा, विश्वास और समर्पण के माध्यम से संस्कृति और संस्कारों का संरक्षण किया जा सकता है।

स्वाध्याय और गुरु-वाणी पर भी दिया गया जोर

महामंडलेश्वर स्वामी यतेंद्रानंद गिरि महाराज ने कहा कि स्वाध्याय और आत्ममंथन से मनुष्य के भीतर गुरु के ज्ञान का वास्तविक प्रकाश प्रकट होता है। यह प्रकाश उसे धर्म, सत्य और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

जगतगुरु चक्रपाणि नंद गिरि महाराज ने कहा कि संत संसद के माध्यम से पूरी दुनिया को मानवता और विश्व कल्याण का संदेश दिया जा रहा है। उन्होंने सत्य, दया, अहिंसा, प्रेम और करुणा जैसे सनातन मूल्यों को विश्वभर में फैलाने की आवश्यकता बताई।

युवाओं को संस्कार और भारतीय जीवन-मूल्यों से जोड़ने पर जोर

देवेंद्र ब्रह्मचारी ने कहा कि भारतीय संस्कृति और संस्कारों के पुनर्जागरण के लिए युवा पीढ़ी को संस्कारवान बनाना आवश्यक है। उन्होंने संत समाज से युवाओं को धर्म, अध्यात्म और भारतीय जीवन-मूल्यों से जोड़ने के लिए आगे आने का आह्वान किया।

पांडुरकार सरकार ने कहा कि गुरु-वाणी मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। वहीं एस.पी. स्वामी ने गुरु के प्रति निष्ठा और भगवान के प्रति प्रेम को जीवन में महत्वपूर्ण बताया।

महंत ऋषिश्वरानंद महाराज ने गुरु-शिष्य परंपरा और गुरुकुल व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि ऐसे गुरुकुल होने चाहिए, जहां आधुनिक शिक्षा के साथ धर्म, संस्कृति, चरित्र और भारतीय जीवन-मूल्यों की शिक्षा भी दी जाए।

‘माता से बड़ा कोई गुरु नहीं’

महामनीषी निरंजन स्वामी ने कहा कि माता के समान कोई गुरु नहीं है। यदि मां बचपन से ही बच्चों को अच्छे संस्कार और सनातन संस्कृति का ज्ञान दे तो वही बच्चे आगे चलकर भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों का प्रकाश पूरी दुनिया में फैला सकते हैं।

महामंडलेश्वर स्वामी डॉ. उमाकांतानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर होने से बचाना होगा। उन्होंने बच्चों को प्रारंभ से ही अच्छे संस्कार और भारतीय संस्कृति का ज्ञान देने की जरूरत बताई।

महामंडलेश्वर भूपेंद्र गिरि महाराज ने कहा कि चरित्रवान पीढ़ी के निर्माण के बिना संस्कृति का वास्तविक पुनर्जागरण संभव नहीं है। वहीं पद्मश्री सद्गुरु ब्रह्मेश्वरानंद आचार्य ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन के केंद्र में ईश्वर को रखना चाहिए। आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से ही वास्तविक कल्याण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण संभव है।

युवाओं के साथ हुआ विशेष संवाद

संत संसद के दौरान संत-महात्माओं ने युवाओं के साथ विशेष संवाद भी किया। युवाओं ने धर्म, अध्यात्म, परिवार, संस्कार, संस्कृति और आधुनिक जीवन की चुनौतियों से जुड़े सवाल संतों के सामने रखे। संतों ने उनके सवालों का जवाब देते हुए जीवन को सकारात्मक, अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिए मार्गदर्शन दिया। युवाओं ने भजनों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों के माध्यम से संतों का स्वागत किया और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान दर्शन दरबार में भक्ति, अध्यात्म और भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत वातावरण बना रहा।

विदेशी धरती से दिया ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश

संत संसद में संतों ने सामूहिक रूप से संदेश दिया कि भारतीय संस्कृति और संस्कारों का पुनर्जागरण केवल चर्चा से नहीं, बल्कि उन्हें आचरण और दैनिक जीवन में उतारने से होगा। परिवार संस्कारों की पहली पाठशाला है, माता-पिता प्रथम गुरु हैं और सद्गुरु जीवन को धर्म एवं सत्य की दिशा प्रदान करते हैं।

संत संसद का संचालन इसके आयोजक एवं नेटवर्क 10 न्यूज चैनल के एमडी व एडिटर-इन-चीफ संजय गिरि ने किया है। विदेशी धरती पर आयोजित संत संसद के माध्यम से सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा, चरित्र निर्माण, विश्व शांति, मानव कल्याण और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश विश्वभर तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।