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भारत को मॉनसून की बारिश का इंतजार, लेकिन अल नीनो का बढ़ रहा खतरा

New Delhi: देश के कई हिस्सों में लोग भीषण गर्मी से बेहाल हैं और मॉनसून के बादलों का इंतजार कर रहे हैं। मौसम वैज्ञानिक एक ऐसी मौसमी घटना पर बारीकी से नजर रख रहे हैं, जिसका असर आने वाले महीनों में भारत के मौसम पर पड़ सकता है। शायद ज्यादातर लोगों ने इसके बारे में सुना होगा।

ये है 'अल नीनो'– एक प्राकृतिक घटना, जिसमें मध्य और भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ जाता है। अल नीनो दुनिया भर में मौसम के स्वरूप को प्रभावित करता है, जिसमें भारत भी शामिल है; यहां इसके कारण मॉनसून की बारिश कम होने की बात कही जाती है। हालांकि अभी यह मौसमी घटना कमजोर है, लेकिन जानकारों का कहना है कि धीरे-धीरे इसके मजबूत होने और सितंबर तक पूरी तरह मजबूत हो जाने की आशंका है।

हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो होने का मतलब हमेशा कमजोर मॉनसून नहीं होता है। भारत का मॉनसून कई मौसम प्रणालियों से प्रभावित होता है और हिंद महासागर का नीनो जैसे अनुकूल कारक अल नीनो के असर को कम करने में मदद कर सकते हैं।

हिंद महासागर का नीनो एक ऐसी मौसमी घटना है, जो पश्चिमी और पूर्वी हिंद महासागर के बीच समुद्र की सतह के तापमान में अंतर को बताती है। सकारात्मक हिंद महासागर नीनो अक्सर भारत के कुछ हिस्सों में बारिश बढ़ाता है।

हालांकि, बन रहा अल-नीनो भारत के किसानों के लिए चिंता का विषय है। मौसम विभाग के मुताबिक देश में चार जून से 18 जून के बीच बारिश में 41 फीसदी की कमी देखी गई है। मध्य भारत में बारिश में 67 फीसदी की कमी है, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 42 फीसदी की कमी है, जिससे कई इलाकों में बुवाई और फसल की बढ़त को लेकर चिंता बढ़ गई है।

मौसम विभाग का कहना है कि वो किसानों को लगातार जानकारी दे रहा है, ताकि वे आगे की योजना बना सकें और कम बारिश के असर को कम करने के उपाय कर सकें। दक्षिण-पश्चिम मॉनसून का उत्तर की ओर धीमी गति से बढ़ना और भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थिति का बनना, खरीफ की फसलों पर गंभीर असर डाल सकता है, क्योंकि इन फसलों को अच्छी तरह उगने के लिए समय पर बारिश की जरूरत होती है।

अगले दो महीनों में मॉनसून का प्रदर्शन खेती, जल संसाधनों और समय पर होने वाली बारिश पर निर्भर लाखों लोगों की आजीविका के लिए बहुत अहम होगा।