Breaking News

दलबदल कानून के तहत AAP दाखिल करेगी याचिका, संजय सिंह बोले - सभापति को पत्र देंगे     |   केरल के CM की हीटवेव से बचाव और तैयारियों पर कल सुबह 11 बजे हाई लेवल मीटिंग करेंगे     |   WB चुनाव: CRPF के DG ने हाई लेवल बैठक की, 2nd फेज वोटिंग तैयारियों का जायजा लिया     |   बिहार: राज्यपाल से मुलाकात करने के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लोक भवन से रवाना     |   AAP को छोड़कर राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल बीजेपी में शामिल हुए     |  

'सनातन धर्म में जाति का कोई स्थान नहीं', संत संसद में बोले जगद्गुरु स्वामी चक्रपाणि नंद गिरी जी महाराज

जयपुर में आयोजित ‘संत संसद 2026’ में आस्था के साथ देशप्रेम का विशेष संगम देखने को मिला। इस भव्य कार्यक्रम का आयोजन नेटवर्क 10 न्यूज चैनल द्वारा किया गया। शुरुआत में संतों ने अमर जवान ज्योति पर पहुंचकर शहीदों को नमन किया। वहीं, महिलाओं ने कलश यात्रा के जरिए संतों का जोरदार स्वागत किया। 

इस विशेष कार्यक्रम में जगद्गुरु स्वामी चक्रपाणि नंद गिरी जी महाराज भी शामिल हुए। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि जब देश गुलाम था, तब भी अगर किसी ने मुगलों से टक्कर ली तो वह अखाड़ों के संत ही थे। यदि संतों ने उस समय संघर्ष न किया होता, तो कुंभ जैसे आयोजन भी समाप्त हो चुके होते। अंग्रेजों के समय में भी अखाड़ा परंपरा जारी रही, क्योंकि संत हमेशा से राष्ट्रवादी रहे हैं।

उन्होंने कहा कि आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने चारों पीठों की स्थापना कर राष्ट्र को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता में बांधने का कार्य किया। उसी का परिणाम है कि आज भी भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान सुरक्षित बनी हुई है। उन्होंने कहा कि हमारे शास्त्रों में “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” का संदेश दिया गया है, यानी पूरे विश्व को परिवार मानने की भावना हमारी परंपरा में रही है, लेकिन आज हमारे अपने घर में ही संकट खड़ा हो गया है।

महाराज ने कहा कि हमारे मठ-मंदिर और भगवा परंपरा कहीं न कहीं संकट में हैं और इन्हें बचाने के लिए गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। उन्होंने संत संसद के आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास समाज को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने गौ संरक्षण के लिए सख्त कानून बनाने की मांग करते हुए कहा कि गौ माता सनातन धर्म की अमूल्य धरोहर हैं और उनमें सभी देवी-देवताओं का वास माना जाता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मठ-मंदिरों की आय अन्य कार्यों में न लगाकर उसी परंपरा के संरक्षण और विकास, जैसे गुरुकुलों और धार्मिक संस्थानों, पर खर्च की जानी चाहिए।

जाति व्यवस्था पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में मूल रूप से जाति नहीं, बल्कि वर्ण व्यवस्था थी, जो कर्म के आधार पर निर्धारित होती थी। “भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि वर्ण व्यवस्था गुण और कर्म के आधार पर है। हम और आप कौन होते हैं जाति बांटने वाले,”।

महाराज ने जोर देकर कहा कि जाति एक राजनीतिक इकाई बन गई है, जिसे समाप्त कर कर्म के आधार पर समाज को संगठित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि हम जाति भेद छोड़कर कर्म के आधार पर सम्मान देंगे, तो देश का विकास होगा और भारत पुनः विश्व गुरु बन सकता है।

कार्यक्रम के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या इसकी शुरुआत संतों को करनी चाहिए, तो उन्होंने कहा कि संतों ने इसकी शुरुआत पहले ही कर दी है। “वृक्ष कभी अपने फल नहीं खाता, नदी अपना जल नहीं संजोती—इसी तरह संत का जीवन परमार्थ के लिए होता है,”।

अंत में उन्होंने समाज से एकजुट होकर सनातन मूल्यों की रक्षा करने और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया।