यह सितंबर 2001 की बात है. कोलकाता में पूरे हेस्टिंग रोड पर पानी भरा हुआ था. हुगली का पानी उछल-उछल कर बड़ा बाजार की गलियों को अपने घेरे में ले रहा था. वे श्राद्धों के दिन थे. एक दिन अलीपुर स्थित अपने आवास से बीके पॉल एवेन्यू के अपने दफ्तर आते हुए मुझे असंख्य औरतें दिखीं जो साड़ी कमर में खोंसे इस पानी के बीच खड़ी बादलों से ढके सूर्य को जल अर्पण कर रही थीं. मैंने अपने ओड़िया ड्राइवर से पूछा, यह क्या हो रहा है. उसने बताया, ये लोग अपने पितरों का तर्पण कर रहे हैं. तब तक उत्तर भारत में स्त्रियां पितर तर्पण नहीं करती थीं. लेकिन बंगाल में पुरुष सत्ता इतनी प्रभावी कभी नहीं रही. वहां स्त्रियां पहले से पितर तर्पण करती आ रही हैं. उत्तर में तो अभी भी इस तरह के दृश्य आम नहीं हैं. वे महिलाएं कोई बिहार या यूपी की नहीं थीं बल्कि विशुद्ध बंगाली थीं.