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असहमति देशद्रोह नहीं, नेता-केंद्रित परंपरा तोड़ने का प्रयास करना चाहिए: त्यागी

नयी दिल्ली, 17 अक्टूबर (भाषा) राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के नेता केसी त्यागी ने शुक्रवार को कहा कि असहमति देशद्रोह नहीं है और हर लोकतंत्रवादी तथा गांधीवादी को उस परंपरा को तोड़ने का प्रयास करना चाहिए, जिसमें नेता, पार्टी और देश का पर्याय बन जाता है।

पत्रकार जयशंकर गुप्त की पुस्तक ‘आपातकाल से अमृतकाल’ के विमोचन कार्यक्रम में पूर्व सांसद त्यागी ने कहा कि आज दिख रही ‘बीमारियों’ और ‘खराब लक्षणों’ की शुरुआत 2014 के बाद नहीं हुई, बल्कि इनके बीज 1960 और 1970 के दशकों में विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को बर्खास्त किए जाने के दौरान ही बो दिए गए थे।

उन्होंने कहा कि 1969 के बाद शुरू हुई राजनीतिक परंपराओं और परिस्थितियों का असर आज भी दिख सकता है।

त्यागी ने कहा कि जब पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हो जाता है और नेता ही पार्टी तथा देश का पर्याय बन जाता है, तो लोकतंत्रवादियों को इस परंपरा को कमजोर करने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा, “लोकतंत्र अच्छी चीज है, पार्टी व्यवस्था अच्छी चीज है। असहमति होनी चाहिए, असहमति देशद्रोह नहीं है।”

किसी का नाम लिए बिना त्यागी ने कहा कि जब पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हो जाता है और पार्टी का पर्याय नेता बन जाता है, तो वही नेता देश का पर्याय बन जाता है, और यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।

वहीं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोहन प्रकाश ने कहा कि असहमति स्वीकार नहीं करने से समाज को जिस दिशा में ले जाया जा रहा है, उससे बड़ा नुकसान होगा।

हाल के प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए प्रकाश ने कहा कि आज की पीढ़ी जुल्म का प्रतिकार करने के बजाय उसे बर्दाश्त कर रही है और पुलिसकर्मियों को फूल दे रही है।

उन्होंने कहा कि सरकार के पास आंदोलनों से निपटने के दो विकल्प थे—राजनीतिक वार्ता या पुलिस कार्रवाई, लेकिन उसने दूसरा विकल्प चुना।

भाषा नोमान रंजन

रंजन