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अरावली समिति की स्थानीय लोगों से बातचीत का आदिवासी नेताओं एवं विशेषज्ञों ने स्वागत किया

नयी दिल्ली, 14 अक्टूबर (भाषा) आदिवासी नेताओं, नागरिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों और पर्यावरण संरक्षणवादियों ने उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त अरावली समिति की ओर से दक्षिण राजस्थान एवं उत्तर गुजरात के पांचवीं अनुसूची वाले आदिवासी इलाकों में हाल ही में पूरी हुई बातचीत की प्रक्रिया को समावेशी बातचीत की दिशा में एक रचनात्मक और सकारात्मक कदम बताया है।

बुधवार को जारी एक बयान में, पर्यावरण समूह ‘अरावली विरासत जन अभियान’ ने कहा कि आठ से 12 अक्टूबर के बीच हुई बातचीत के दौरान, ऊपर बताए गए दोनों राज्यों के सामुदायिक नेताओं ने पर्यावरण को नुकसान, आदिवासी स्व-शासन, पानी की सुरक्षा और जन स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को समिति के सामने रखा।

मई में उच्चतम न्यायालय के आदेश से बनी यह समिति, अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और सीमा तय करने के बारे में केंद्र सरकार की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा कर रही है।

इसे 30 नवंबर तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपनी है।

अरावली विरासत जन अभियान की सह-संस्थापक नीलम अहलूवालिया ने कहा कि समिति की “उत्तरी गुजरात और दक्षिणी राजस्थान के दो ज़िलों में आदिवासी समुदायों के साथ हालिया बातचीत, अरावली रेंज की गोद में रहने वाले लोगों के लिए एक बहुत ही सकारात्मक कदम रही है”।

राजस्थान की आदिवासी नेता साधना मीणा ने एक बयान में कहा, “पांचवीं अनुसूची वाले इलाकों में, हमारे साझा चरागाहों और पवित्र पहाड़ियों को आदिवासी समुदायों की सहमति के बिना वाणिज्यिक पत्थर खनन के लिए नहीं सौंपा जा सकता है।”

उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि अरावली समिति की अगली रिपोर्ट हमारी ग्राम सभाओं के संवैधानिक अधिकार को हर तरह के वाणिज्यिक शोषण से ऊपर रखेगी।”

भाषा प्रशांत रंजन

रंजन