(अश्वनी श्रीवास्तव)
नयी दिल्ली, 14 अक्टूबर (भाषा) भ्रष्टाचार-रोधी संस्था लोकपाल ने ‘पीएम केयर्स फंड’ के सिलसिले में सरकारी कर्मचारियों द्वारा अपने पद के दुरुपयोग और अंशदान संग्रहण एवं उसे संभालने में गड़बड़ी के आरोपों वाली शिकायत का निस्तारण करते हुए कहा है कि शिकायतकर्ता की दलीलें पहली नजर में अपर्याप्त हैं।
हालांकि, लोकपाल ने शिकायतकर्ता को एक सही और नयी शिकायत दर्ज कराने की अनुमति दी, जिसमें अपराध से जुड़े अहम तथ्य और विवरण प्रमुखता से पेश किये गये हों।
‘पीएम केयर्स फंड’ के संबंध में कथित चूक और गड़बड़ियों को लेकर ‘‘उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों’’ के खिलाफ इस साल जून में शिकायत दर्ज कराई गई थी।
केंद्र सरकार ने मार्च 2020 में यह फंड बनाया था। इसका मुख्य मकसद कोविड महामारी जैसी किसी भी आपात स्थिति या संकट से निपटना और प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाना है। इसे 27 मार्च 2020 को एक सरकारी परमार्थ न्यास के तौर पर पंजीकृत किया गया था।
ताज़ा ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2025 तक पीएम केयर्स फंड फंड में कुल 8,452 करोड़ रुपये थे, जबकि एक साल पहले उसमें 7,173 करोड़ रुपये थे।
प्रधानमंत्री इस फंड के पदेन अध्यक्ष हैं जो पूरी तरह से स्वैच्छिक योगदान से चलता है और जिसे कोई बजटीय सहायता नहीं मिलती है।
अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर की अध्यक्षता वाली सात-सदस्यीय लोकपाल पीठ के नौ अक्टूबर के आदेश में कहा गया, ‘‘शिकायत को देखने के बाद, प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि आरोपों का मुख्य आधार ऐसी गतिविधियां हैं जो 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988' के अध्याय-तीन के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आती हैं।’’
लोकपाल ने कहा कि इस अध्याय में भ्रष्टाचार-रोधी कानून के तहत ‘अपराधों और सजा’ से जुड़े प्रावधान हैं।
लोकपाल ने शिकायतकर्ता से एक ‘हलफ़नामा’ दाखिल करने को कहा जिसमें यह बताया जाए कि मौजूदा शिकायत में लगाए गए कौन-से आरोप 1988 के कानून के तहत सज़ा-योग्य अपराधों की श्रेणी में आते हैं।
शिकायतकर्ता ने 26 अगस्त को विधिवत शपथ-पत्र (हलफ़नामा) दाखिल किया था।
लोकपाल ने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण पहली नज़र में ज़रूरी शर्तों को पूरा नहीं करता है। इसी के साथ लोकपाल ने शिकायत का निपटारा कर दिया।
लोकपाल के आदेश में कहा गया है, ‘‘....हम शिकायतकर्ता को एक उचित और विस्तृत नयी शिकायत दर्ज कराने की अनुमति देते हैं, जिसमें मुख्य रूप से 1988 के अधिनियम के अध्याय-तीन के तहत अपराध (अपराधों) से जुड़े ज़रूरी तथ्यों और विवरणों पर ज़ोर दिया गया हो।’’
लोकपाल ने कहा है कि अगर ऐसी कोई नयी शिकायत सभी तरह से पूरी हो, तो लोकपाल उस पर उचित रूप से विचार कर सकता है और इस प्रक्रिया में वह पिछली शिकायत या इस आदेश से प्रभावित नहीं होगा।
भाषा
राजकुमार अविनाश
अविनाश