जम्मू, 14 अक्टूबर (भाषा) जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने नेताओं के लिए सरकारी आवास से जुड़ी नीति पर स्पष्टीकरण मांगा है।
उच्च न्यायालय ने यह स्पष्टीकरण तब मांगा जब उसे अवगत कराया गया कि एक समिति की सिफारिश पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता रवींद्र रैना अगले साल मार्च तक अपने सरकारी आवास में रह सकते हैं।
बारह अक्टूबर को प्रोफ़ेसर एस.के. भल्ला की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायमूर्ति राजेश सेखरी की खंडपीठ ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से उस नीति के बारे में सवाल किया, जिसके तहत दोनों नेताओं को सरकारी आवास में टिके रहने की इजाजत दी गई है।
केंद्रशासित प्रशासन की ओर से वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता मोनिका कोहली ने अदालत को बताया कि 14 अगस्त को एक बैठक में समिति ने आजाद और भाजपा की जम्मू कश्मीर इकाई के पूर्व अध्यक्ष रैना के मामलों पर विचार किया था।
कोहली ने खंडपीठ को बताया कि समिति ने दोनों नेताओं के पक्ष में (आवास) आवंटन जारी रखने की सिफारिश की थी।
उन्होंने खंडपीठ को बताया कि इसके बाद ये सिफारिशें सक्षम अधिकारी के सामने रखी गईं, जिन्होंने उचित विचार-विमर्श के बाद उन्हें मार्च 2027 या अगली समीक्षा तक (इनमें से जो भी पहले हो) आवास अपने पास रखने की अनुमति दे दी।
हालांकि खंडपीठ ने ऐसी आवंटन नीति के बारे में स्पष्टीकरण मांगा। खंडपीठ ने कोहली से उन नियमों के बारे में पूछा, जिनके तहत संबंधित समिति नेताओं को सरकारी आवास अपने पास रखने की अनुमति देने की अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करती है।
कोहली ने नेताओं द्वारा सरकारी आवास अपने पास रखने से संबंधित एक समान नीति के मुद्दे पर उचित हलफनामा दाखिल करने तथा अदालत की मदद करने के लिए समय देने का अनुरोध किया।
उनके इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई 12 नवंबर के लिए तय कर दी।
चूंकि खंडपीठ अभी श्रीनगर में है, इसलिए सुनवाई डिजिटल तरीके से हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सरकारी आवास पर अनधिकृत कब्जे को सुरक्षा के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता।
याचिकाकर्ता के वकीलों-- एस एस अहमद और सुप्रिया चौहान-- ने खंडपीठ के समक्ष 26 दिसंबर, 2022 के एक आदेश का जिक्र किया। इस आदेश में एक खंडपीठ ने सुरक्षा कारणों से सरकारी संपत्तियों से बेदखली के खिलाफ कुछ लोगों को सुरक्षा देने से इनकार कर दिया था।
अहमद और चौहान ने कहा कि अपनी बात के समर्थन में इस खंडपीठ ने उच्चतम न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला दिया था।
भाषा राजकुमार सुरेश
सुरेश