नयी दिल्ली, 14 अक्टूबर (भाषा) दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के संकाय सदस्यों और अधिकारियों ने छात्रावास के निर्माण के लिए उच्च शिक्षा वित्तपोषण एजेंसी (एचईएफए) से कर्ज लेने के प्रस्ताव पर चिंता जताते हुए कहा है कि संबंधित राशि चुकाने का बोझ अंततः छात्रों पर अधिक शुल्क के रूप में पड़ सकता है।
यह चिंता डीयू की कार्यकारी परिषद (ईसी) की ओर से 5,889 करोड़ रुपये के एक प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने की पृष्ठभूमि में आई है, जिसके तहत नये छात्रावास बनाकर और दो मौजूदा छात्रावास का पुनर्निर्माण करके 21,895 छात्रों के लिए आवासीय सुविधाओं का विस्तार किया जाना है।
कार्यकारी परिषद की अहम बैठक में परिषद के सदस्य राजपाल सिंह पवार ने छात्रावास की आवासीय क्षमता बढ़ाने का तो समर्थन किया, लेकिन इन परियोजनाओं के लिए एचईएफए से कर्ज लेने का विरोध किया।
उन्होंने मांग की कि शुरुआती राशि 1,250 करोड़ रुपये रखी जाए और इसके बाद कॉलेज तथा विश्वविद्यालयों में छात्रावास के लिए धन जुटाने के प्रयास किए जाएं।
परिषद के एक सदस्य ने बताया कि पवार ने कर्ज लेने के बजाय सरकारी अनुदान-सहायता के जरिये इन परियोजनाओं के लिए धन जुटाने पर जोर दिया। शिक्षकों की ओर से साझा किए गए एक पत्र के मुताबिक, इसके बाद कार्यकारी परिषद सरकारी अनुदान लेने पर सहमत हो गई।
ईसी सदस्य ने कहा, “बैठक के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन ने एचईएफए से लिए जाने वाले कर्ज को चुकाने को लेकर कथित तौर पर चिंता भी जताई।”
इससे पहले, वित्त समिति की बैठक में समिति के सदस्य जेएल गुप्ता ने छात्रावास के निर्माण के संबंध में भवन समिति की सिफारिशों पर अपनी राय रखी थी और प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए खुली प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया अपनाने की मांग की थी।
गुप्ता ने छात्रावास की आवासीय क्षमता बढ़ाने का स्वागत किया, लेकिन वित्तीय और प्रशासनिक निगरानी के लिए सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं में बड़ी मात्रा में सार्वजनिक धन का इस्तेमाल होना है।
किरोड़ीमल कॉलेज में अंग्रेजी के एसोसिएट प्रोफेसर रुद्राशीष चक्रवर्ती ने भी एचईएफए से कर्ज लेने के प्रस्ताव की आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि मूलधन और ब्याज चुकाने का बोझ भविष्य में छात्रों पर पड़ सकता है।
चक्रवर्ती ने कहा कि अनुदान-सहायता एक वैकल्पिक वित्तपोषण व्यवस्था है, जिसका विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) 1956 से इस्तेमाल कर रहा है। उन्होंने कहा कि इसके जरिये छात्रों पर कर्ज चुकाने का बोझ डाले बिना छात्रावास के बुनियादी ढांचे के लिए धन जुटाया जा सकता है।
भाषा पारुल रंजन
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