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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शासकीय अधिवक्ताओं से दुर्व्यवहार पर डीजीपी को निर्देश जारी किए

प्रयागराज, 13 अक्टूबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को सभी पुलिस अधिकारियों को एक सर्कुलर जारी कर यह चेतावनी देने को कहा है कि अनुपालन के लिए अदालत के आदेशों की सूचना देने वाले शासकीय अधिवक्ताओं के साथ दुर्व्यवहार, अदालत की अवमानना के समान होगा और उससे कानून के अनुसार सख्ती से निपटा जाएगा।

सोमवार को, आजमगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) राजेश कुमार सिंह के बर्ताव पर नाराजगी जताते हुए न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने पीआरओ को शाम पांच बजे तक हिरासत में रखने का निर्देश दिया जिसके बाद उन्हें जाने दिया गया।

पीआरओ ने कथित तौर पर अपर शासकीय अधिवक्ता के साथ बुरा बर्ताव किया था।

पीठ ने कहा कि अपर शासकीय अधिवक्ता, न्यायिक निर्देशों के पालन में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाले अधिकारी होते हैं।

अदालत ने कहा, ‘‘जब कभी वे किसी अधिकारी को इस अदालत के आदेश के अनुपालन के बारे में सूचित करते हैं, वे इस अदालत के आदेश के अनुपालन में अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे होते हैं और उनके साथ किसी अधिकारी द्वारा चाहे वह सरकार का सबसे बड़ा अधिकारी क्यों ना हो, दुर्व्यवहार करना अवमानना के समान होगा।’’

एसएसपी ने पीठ को बताया कि उन्होंने सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया था और उसे पीआरओ के पद से हटा दिया था। इस कार्रवाई की अदालत ने सराहना की।

अदालत का यह आदेश, सचिन यादव नाम के एक व्यक्ति की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आया जिसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 64(1) और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम की धारा 66ई एवं 67ए के तहत मामला दर्ज किया गया था। अदालत ने जमानत याचिका खारिज कर दी।

एसएसपी ने एक जांच अधिकारी के खिलाफ जारी गैर जमानती वारंट के अनुपालन के बारे में बताया कि आठ सितंबर, 2026 को अपर शासकीय अधिवक्ता से सूचना मिलने पर उसे महाराजगंज पुलिस थाना को भेज दिया गया और जनरल डायरी में उसकी प्रविष्टि कर दी गई।

हालांकि, उप निरीक्षक सुभाष सिंह ने अनुपालन सुनिश्चित किए बगैर उसे अपने पास रखा। प्रारंभिक जांच में एसएचओ की लापरवाही पाई गई और दोनों अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।

वारंट की व्यक्तिगत तौर पर तामील सुनिश्चित नहीं करने के लिए एसएसपी की माफी स्वीकार करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया, ‘‘सही कानूनी स्थिति यह है कि जब भी किसी अधिकारी को उच्च न्यायालय से जारी गैर जमानती वारंट तामील करने के लिए मिलता है तो उसे व्यक्तिगत रूप से उस व्यक्ति की गिरफ्तारी सुनिश्चित करनी चाहिए और उसे उच्च न्यायालय के समक्ष पेश करना चाहिए क्योंकि उच्च न्यायालय द्वारा जारी गैर जमानती वारंट के मामले में जिला अदालत जमानत दे सकती है।’’

एसएसपी के बेदाग रिकॉर्ड और एक मृत संदिग्ध की दो नाबालिग बेटियों को गोद लेने के उनके मानवीय कदम की सराहना करते हुए अदालत ने उनके खिलाफ मामला बंद कर दिया और उम्मीद जताई कि वह भविष्य में अधिक सावधानी बरतेंगे।

अदालत ने इस आदेश की प्रति डीजीपी को भेजने का निर्देश दिया। अदालत 2024 में आजमगढ़ के एक थाना में दर्ज मामले में सचिन यादव नाम के व्यक्ति की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस व्यक्ति के खिलाफ एक दुष्कर्म पीड़िता का अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड करने का आरोप है।

भाषा सं राजेंद्र सुरभि

सुरभि