नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर (भाषा) बाजार नियामक सेबी ने मंगलवार को सभी सार्वजनिक निर्गम के लिए निगरानी एजेंसी की नियुक्ति अनिवार्य करने का प्रस्ताव किया। इसके तहत निर्गम का आकार चाहे जो भी हो, कंपनियों को यह एजेंसी नियुक्त करनी होगी।
साथ ही, निर्गम से जुटाई गई राशि के इस्तेमाल की निगरानी में सहयोग नहीं करने पर सूचीबद्ध कंपनियों पर हर मामले में 50,000 रुपये का जुर्माना लगाने का भी प्रस्ताव है।
ये प्रस्ताव सेबी के सूचीबद्धता दायित्व एवं खुलासा आवश्यकताएं (एलओडीआर) नियम, 2015 की व्यापक समीक्षा का हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य सार्वजनिक निर्गमों के जरिये जुटाई गई राशि के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है।
नियामक ने इन प्रस्तावों पर तीन नवंबर तक आम लोगों से सुझाव मांगे हैं।
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अपने परामर्श पत्र में प्रस्ताव किया है कि निर्गम का आकार चाहे जो भी हो, कंपनियों को निगरानी एजेंसी नियुक्त करनी होगी।
निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए नियामक ने यह अधिकार देने का भी प्रस्ताव रखा है कि यदि सूचीबद्ध कंपनियां निगरानी प्रक्रिया के दौरान सहयोग नहीं करती हैं, तो निगरानी एजेंसियां अपनी रिपोर्ट सीधे शेयर बाजारों को सौंप सकें।
सेबी के प्रस्ताव के अनुसार, ‘‘निगरानी प्रक्रिया के दौरान सूचीबद्ध कंपनी के सहयोग नहीं करने की स्थिति में निगरानी एजेंसी उपलब्ध जानकारी के आधार पर सीधे शेयर बाजारों को रिपोर्ट सौंपेगी। इसके साथ कंपनी के असहयोग के संबंध में एक बयान भी देना होगा।’’
यदि कंपनी बाद में पूरी जानकारी उपलब्ध कराती है, तो निगरानी एजेंसी को 15 दिन के भीतर शेयर बाजारों को पूरी रिपोर्ट सौंपनी होगी। शेयर बाजारों को भी ऐसी रिपोर्ट और असहयोग संबंधी बयानों को अपनी वेबसाइट पर प्रमुखता से दिखाना होगा।
नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए सेबी ने निगरानी एजेंसी की ओर से संबंधित तिमाही या छमाही रिपोर्टिंग अवधि में दर्ज किए गए कंपनी के असहयोग के प्रत्येक मामले में 50,000 रुपये का जुर्माना लगाने का प्रस्ताव किया है।
नियामक ने अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए चरणबद्ध कार्रवाई व्यवस्था का भी प्रस्ताव रखा है। इसके तहत निगरानी रिपोर्ट सौंपने की निर्धारित तारीख बीतने के 30 दिन के भीतर शेयर बाजार नियमों का पालन नहीं करने वाली कंपनियों को नोटिस जारी करेंगे।
यदि चूक जारी रहती है, तो कंपनी के प्रवर्तकों को नोटिस जारी किए जाएंगे। इसके बाद भी नियमों का पालन नहीं होने पर डिपॉजिटरी के माध्यम से उनके डीमैट खातों पर रोक लगायी जाएगी।
इसके अलावा, सेबी ने प्रस्ताव किया है कि असहयोग के मामलों का समाधान होने तक कंपनियों को अपनी निगरानी एजेंसी बदलने की अनुमति नहीं होगी।
भाषा रमण अजय
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